कीरति की कामना चढ़ाय चित्त - श्री कान्त किशोर, श्री कान्त किशोर जी की वाणी (11)

कीरति की कामना चढ़ाय चित्त - श्री कान्त किशोर, श्री कान्त किशोर जी की वाणी (11)

(कवित्त)
कीरति की कामना चढ़ाय चित्त, वित्त आस,
कविता जिन कान्त-केलि-कुंजन की गाई है।
छाँड़्यौ घरबार, करैं देह की सिंगार चारू,
आस-वासना की मन दुंदभी बजाई है॥ [1]
जोग-जप बाँधैं, कहा संजम, समाधि व्याधि,
साधैं रहौ साँस साँसना ही हाथ आई है।
जाकैं थिर प्रीति हरिदास-पाद-पद्म सौं न,
ताकैं रस-रीति की न रंचहू समाई है॥ [2]

- श्री कान्त किशोर, श्री कान्त किशोर जी की वाणी (11)

जिन्होंने अपने चित्त में यश की कामना और धन की आशा रखकर श्रीराधा-कृष्ण के कुंज-विलास की काव्य-रचनाएँ गाई है अथवा घर-बार का त्याग करने पर भी देह की सुख-सुविधा और श्रृंगार आदि की इच्छा संजोई है, उनके मन में सांसारिक आशाओं और वासनाओं का नगाड़ा ही बज रहा है। [1]

वह चाहे योग और जप के नियमों में बँधा रहे, संयम और समाधि का अभ्यास करे अथवा श्वासों को साधने में लगा रहे, इन सब साधनों से उसे क्या प्राप्त होगा यदि उसका मन ही संसार में आसक्त है? जिसके हृदय में अनन्य नृपति रसिक चूड़ामणि स्वामी श्रीहरिदास जी के चरणकमलों के प्रति अटल प्रेम नहीं है, उसके भीतर इस दिव्य रस-रीति का लेशमात्र भी प्रवेश नहीं हो सकता। [2]