सेज सुसंपति जुगल रति, दंपति गति मति नेह।
निरखैं नित्य-बिहार सुख, श्री वृंदावन ग्रेह॥
- श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (45)
श्रीवृन्दावन के दिव्य निकुञ्ज-भवन में सुन्दर शय्या और समस्त मनोहर रस-सामग्रियों से सुशोभित श्रीप्रियाप्रियतम (श्रीराधा-कृष्ण) अपनी अनन्य गति, मति और प्रेम को एक-दूसरे में समर्पित कर परस्पर गहन प्रेम में लीन हैं। श्रीवृन्दावन रूपी उनके निज धाम में युगल दंपति के नित्य-बिहार के अलौकिक सुख का निरंतर दर्शन प्राप्त होता है।
निरखैं नित्य-बिहार सुख, श्री वृंदावन ग्रेह॥
- श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (45)
श्रीवृन्दावन के दिव्य निकुञ्ज-भवन में सुन्दर शय्या और समस्त मनोहर रस-सामग्रियों से सुशोभित श्रीप्रियाप्रियतम (श्रीराधा-कृष्ण) अपनी अनन्य गति, मति और प्रेम को एक-दूसरे में समर्पित कर परस्पर गहन प्रेम में लीन हैं। श्रीवृन्दावन रूपी उनके निज धाम में युगल दंपति के नित्य-बिहार के अलौकिक सुख का निरंतर दर्शन प्राप्त होता है।

