ठाड़े री मोहन चरण पहाड़ी - श्री हित वृंदावन दास जी

ठाड़े री मोहन चरण पहाड़ी - श्री हित वृंदावन दास जी

ठाड़े री मोहन चरण पहाड़ी।
पीताम्बर फहरात पवन बस, मुकुट लटक छवि न्यारी॥ [1]
पुनि कीरति की लली भली छवि, ता ग्रीवा भुजडारी।
जाके रूप रंग रस बस ह्वै, वन-वन नचत बिहारी॥ [2]
उन्मद मदन रहत निसिवासर, संग ललित ललनारी।
वृन्दावन हित विमल कुण्ड तट, केलि विमल विस्तारी॥ [3]

- श्री हित वृंदावन दास जी

हे सखी! श्रीमोहन चरण पहाड़ी पर खड़े हैं। वायु के वेग से उनका पीतांबर फहरा रहा है और मस्तक पर झुके मुकुट की शोभा अत्यंत न्यारी लग रही है। [1]

वहाँ श्री कीर्ति की लाडली श्रीराधा जी की अत्यंत सुंदर छवि है, जिनकी ग्रीवा पर श्रीमोहन ने अपनी भुजा डाल रखी है। उनके रूप, रंग और रस के वशीभूत होकर श्रीबिहारी जी वन-वन में नृत्य करते फिरते हैं। [2]

वे सुंदर सखियों के साथ दिन-रात प्रेमानंद में मग्न रहते हैं। श्रीहित वृंदावन दास जी कहते हैं कि विमल कुंड के तट पर युगल सरकार अपनी निर्मल केलि-लीला का विस्तार कर रहे हैं। [3]