वृंदावन को चूहरौ, बेचि खातु है सूप।
ताकी सरवरि ना करै, आन गाँऊँ कौ भूप॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (43)
श्रीवृन्दावन धाम में निवास करने वाला चूहड़ा समुदाय का वह व्यक्ति भी, जो छाज बेचकर अपना जीवन-निर्वाह करता है, इतना परम सौभाग्यशाली है कि किसी अन्य गाँव अथवा नगर का राजा भी उसकी बराबरी नहीं कर सकता। श्रीधाम वृंदावन के वास की महिमा सर्वोपरि है।
ताकी सरवरि ना करै, आन गाँऊँ कौ भूप॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (43)
श्रीवृन्दावन धाम में निवास करने वाला चूहड़ा समुदाय का वह व्यक्ति भी, जो छाज बेचकर अपना जीवन-निर्वाह करता है, इतना परम सौभाग्यशाली है कि किसी अन्य गाँव अथवा नगर का राजा भी उसकी बराबरी नहीं कर सकता। श्रीधाम वृंदावन के वास की महिमा सर्वोपरि है।

