नवरंगी प्यारो मोहना।
सीस मुकट कर लकुट पीतपट, वृज जन दृग लगे गोहना॥ [1]
कोटि काम अभिराम स्याम छबि, अंग अंग अति सोहना।
गोविंदसरन वृषभान दुलारी, रूप अनुपम जोहना॥ [2]
- श्री गोविंद शरण देवाचार्य, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (29)
नित्य नवीन प्रेम-रंगों में रँगे हुए श्रीमोहन अत्यन्त मनोहर और प्यारे हैं। उनके मस्तक पर सुन्दर मुकुट, हाथ में लकुटी और शरीर पर पीताम्बर सुशोभित है। उनके इस मनमोहक स्वरूप ने समस्त ब्रजवासियों के नेत्रों को अपनी ओर आकर्षित कर लिया है, मानो उनके नेत्र उसी रूप में बँध गए हों। [1]
श्रीश्यामसुन्दर की अनुपम छवि करोड़ों कामदेवों से भी अधिक मनोहर है और उनके अंग-अंग की शोभा अत्यन्त सुन्दर है। श्री गोविंदशरण जी कहते हैं कि वृषभान दुलारी (श्री राधा) के संग उनके इस अनुपम रूप का दर्शन कीजिए। [२]
सीस मुकट कर लकुट पीतपट, वृज जन दृग लगे गोहना॥ [1]
कोटि काम अभिराम स्याम छबि, अंग अंग अति सोहना।
गोविंदसरन वृषभान दुलारी, रूप अनुपम जोहना॥ [2]
- श्री गोविंद शरण देवाचार्य, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (29)
नित्य नवीन प्रेम-रंगों में रँगे हुए श्रीमोहन अत्यन्त मनोहर और प्यारे हैं। उनके मस्तक पर सुन्दर मुकुट, हाथ में लकुटी और शरीर पर पीताम्बर सुशोभित है। उनके इस मनमोहक स्वरूप ने समस्त ब्रजवासियों के नेत्रों को अपनी ओर आकर्षित कर लिया है, मानो उनके नेत्र उसी रूप में बँध गए हों। [1]
श्रीश्यामसुन्दर की अनुपम छवि करोड़ों कामदेवों से भी अधिक मनोहर है और उनके अंग-अंग की शोभा अत्यन्त सुन्दर है। श्री गोविंदशरण जी कहते हैं कि वृषभान दुलारी (श्री राधा) के संग उनके इस अनुपम रूप का दर्शन कीजिए। [२]

