रे मन श्रीवृन्दावन चल - श्री हित गोपाल दास, निकुंज रस वल्लरी (52)
हे मन, श्री वृन्दावन को चल, जहाँ सरस एवं सुखद श्री यमुना जी अति शोभायमान हैं, जिनका जल कल-कल करता हुआ बहता है।
राग तिलंग खमाज थाट से संभंधित है। यह बहुत ही मधुर राग है और कर्नाटक संगीत के राग हंसश्री से मिलता जुलता है। इस राग को रात्रि के दूसरे प्रहर में अर्थात 9 बजे से 12 बजे के बीच में गाया जाता है ।
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हे मन, श्री वृन्दावन को चल, जहाँ सरस एवं सुखद श्री यमुना जी अति शोभायमान हैं, जिनका जल कल-कल करता हुआ बहता है।
मैं श्री राधा के चरण कमलों की ही अनन्य शरण लेता हूँ, जिन श्री चरणों के आसरे श्री राधारमण लाल [कृष्ण] भी नित्य रहते हैं ।
श्री राधा की एक अंतरंग सखी दूसरी सखी से कहती है: हे सखी, मैं तो श्री राधा चरणों की ही दृढ़ उपासी हूँ । उनके चरणों के अनन्य बल के गर्व से ही दिन रात भरी रहती हूँ एवं उनकी ही निज सेवा में मैं नित्य लगी रहती हूँ ।