नेहिन की गति जानत भाखी - श्री किशोरी अलि जी, अष्टयाम प्रथम (36)
प्रेमियों की गति प्रेमी ही जानते हैं। जैसे गंगा जी में रहने वाला पपीहा पक्षी भी साक्षात गंगा जी के पानी को छोड़कर स्वाति बूँद की ओर ही निहारता है।
अष्टयाम प्रथम श्री वंशी अली के शिष्य श्री किशोरी अली द्वारा लिखा गया है।
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प्रेमियों की गति प्रेमी ही जानते हैं। जैसे गंगा जी में रहने वाला पपीहा पक्षी भी साक्षात गंगा जी के पानी को छोड़कर स्वाति बूँद की ओर ही निहारता है।
रूप की राशि किशोरी श्री राधिका मन का हरण करने वाली हैं जिन्होंने अपनी चँचल दृष्टि के कटाक्ष के बाणों से प्रियतम [कृष्ण] का हृदय बेध दिया है ।
श्री किशोरी अली जी कहते हैं "मेरी आँखों में तो दामिनी स्वरुप श्री राधा एवं नवघन स्वरुप श्री श्यामसुंदर का ही ध्यान बना रहता है।"