भँवर गीत (नंददासजी)

भँवरगीत नंददासजी द्वारा रचित एक अनुपम ब्रजभाषा काव्य है, जिसमें गोपी-उद्धव संवाद के माध्यम से प्रेम-भक्ति की श्रेष्ठता को दर्शाया गया है। इसमें उद्धव ज्ञान का संदेश लेकर गोपियों के पास आते हैं, परंतु गोपियाँ अपनी भक्ति और विरह की तीव्रता से उनका ज्ञान-गर्व मिटा देती हैं। यह काव्य श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध की पृष्ठभूमि पर आधारित है और भक्ति मार्ग को सबसे श्रेष्ठ बताता है। गोपियों का कृष्ण के प्रति एकनिष्ठ प्रेम ही इस ग्रंथ की आत्मा है।

3 लेख उपलब्ध हैं

  1. गोपी प्रेम प्रसाद सो, हौ ही सीख्यौ आय - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, भँवर गीत (68.2)

    गोपियों के निष्काम प्रेम के प्रभाव एवं कृपा प्रसाद से आज उद्धव जैसे ब्रह्मज्ञानी भी, ज्ञान/योग की सब दुविधाएँ मिटाकर, प्रेम-मार्गी रसिक हो गए।

  2. कै ह्वै रहौं द्रुम गुल्म लता बेली बन माहीं - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, भँवर गीत (67.1)

    ब्रह्मज्ञानी उद्धव भगवान श्री कृष्ण से कहते हैं — “हे प्रभु! अब मैं सदा-सदा के लिए ब्रज का कोई वृक्ष, लता या वेलि बनकर ब्रज में ही रहना चाहता हूँ, ताकि जब ये प्रेम की ध्वजा स्वरूप ब्रजांगनाएँ इधर-उधर विचरण करें, तो उनकी छाया स्वाभाविक रूप से मुझ पर पड़े और मैं कृतार्थ हो जाऊँ।”

  3. अब रहिहौं ब्रजभूमि की ह्वै पगमारग धूरि - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, भँवर गीत (66.2)

    ब्रह्मज्ञानी उद्धव कहते हैं—“हे प्रभु! अब मैं सदा के लिए ब्रज में ही ब्रज की रज बनकर वास करना चाहता हूँ, ताकि जब यह प्रेम की ध्वजा स्वरूप ब्रजांगनाएँ विचरण करें, तो उनके चरणों की धूल मुझ पर पड़े और मैं कृतार्थ हो जाऊँ। यही मेरे जीवन का परम आधार है।”