नाहिं मोहि साधन आराधन सुख तीन लोक - श्री हित कृष्णदास जी भावुक की वाणी, श्री वृंदावनष्टक (8)
मुझे त्रैलोक्य सुख की और उसकी आराधना हेतु किसी भी साधन की आवश्यकता नहीं है। सुन्दर संपत्ति का मुख्य स्थल लेने की भी मुझे आवश्यकता नहीं है।
श्री हित कृष्णदास (श्री कृष्णदास भावुक जी) श्री राधावल्लभ संप्रदाय के एक रसिक संत हैं।
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मुझे त्रैलोक्य सुख की और उसकी आराधना हेतु किसी भी साधन की आवश्यकता नहीं है। सुन्दर संपत्ति का मुख्य स्थल लेने की भी मुझे आवश्यकता नहीं है।
श्री लालजी [कृष्ण] दूल्हा हैं और श्री राधा दुल्हन । इन प्रिया लाल के अतिरिक्त अन्य किसी जोड़ी का नाम कवि वृथा ही लेते हैं क्योंकि न तो किसी जोड़ी में कहीं ऐसी अद्भुत छवि है और न ही इस प्रकार की अगाध प्रीति ।
हे मेरी प्राणों से प्यारी श्री राधा! भूलकर भी आप मान न कीजिए; मैं आपकी शरण में हूँ ।