मान लीला दोहावाली [ब्रज विहार]

'मान लीला दोहावाली' श्री नारायण स्वामी द्वारा रचित 'ब्रज विहार' ग्रंथ का तेरहवाँ अध्याय है जिसमें श्री राधा कृष्ण सम्बंधित मान लीला के 116 दोहे संकलित हैं।

4 लेख उपलब्ध हैं

  1. पंकज विषधर मीन मृग - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, मान लीला दोहावाली (94)

    हे प्यारी जू (श्री राधा)! कमल, सर्प, मछली, मृग, बाण, खंजन पक्षी और बादाम — ये सब तुम्हारी आँखों के बिना मूल्य के गुलाम हैं, क्योंकि तुम्हारे नेत्रों की अनुपम छवि ने इनकी शोभा को अर्थहीन कर दिया है।

  2. निरख निरख शोभा हर्ष - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, मान लीला दोहावाली (93)

    श्री राधा की अद्भुत रूप माधुरी को निहार कर श्री कृष्ण के हृदय को अपार आनंद होता है । तब माननी श्री राधा को मनाने के लिए वे अत्यंत विनम्र होकर, डरते-डरते श्री राधा से विनती करने लगते हैं। ऐसी सर्वोच्च स्वामिनी, वृंदावन की अधिष्ठात्री किशोरीजी की जय हो!

  3. बिघन हरन मंगल करन - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, मान लीला दोहावाली (116)

    युगल सरकार श्री राधा कृष्ण के चरण समस्त विघ्नों का हरण करने वाले एवं सदा मंगल करने वाले हैं । श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि अपने निज जनों के जीवन के प्राणों के आधार हैं ।

  4. विनय करूँ कर जोर - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, मान लीला दोहावाली (1)

    मैं रसिक जनों के चरणों में हाथ जोड़कर विनय करता हूँ कि वे मुझ पर ऐसी कृपा करें, जिससे मेरे हृदय में नित्य ही युगल-चरणों का स्मरण और अनुराग बना रहे।