श्री नरहरी देव जी की वाणी

श्री नरहरि देव जी की वाणी, श्री नरहरि देव, वृंदावन धाम के रसिक संत और श्री सरस देव जी के शिष्य द्वारा रस पदों एवं सिद्धांत के पदों की काव्य रचना है। श्री नरहरि देव जी स्वामी हरिदास अष्टचार्य के पांचवें आचार्य थे।

3 लेख उपलब्ध हैं

  1. खेलत रास लाड़िली लाल - श्री नरहरि देव जू की वाणी (11)

    लाड़िली-लाल श्री राधा कृष्ण रास का खेल खेल रहे हैं। प्यारी जू (श्री राधा) तान और गान प्रियतम (कृष्ण) को सिखा रही हैं। इस समय कोई भी अन्य सखी वहाँ नहीं है।

  2. जाकी मनमोहन दृष्टि परे - श्री नरहरि देव, श्री नरहरि देव जू की वाणी (1)

    श्री नरहरि देव जी कहते है, जो कृपापात्र जीव श्री बिहारी जी को आँख भर [भावपूर्ण] निहार लेता है, वो एक प्रकार का बावरा (पागल) हो जाता है, जैसे सावन ऋतु को देखकर कोई अँधा हो जाए तो उसे जीवन भर हरियाली ही हरियाली प्रतीत होती है।

  3. श्री नरहरि दास निरखि तृण तोरति - श्री नरहरि दास, श्री नरहरी देव जी की वाणी (8)

    श्री नरहरि दास जी के शब्दों में युगल सरकार की छवि इतनी मधुर है जिसकी सुन्दरता का वर्णन करना ही असम्भव है। यदि हमारे नयन नित्य ही भर-भरकर श्रृंगार शोभा रस पिया करें, फिर भी यह मन कभी अघायेगा नहीं।