नवरत्नम्

महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य ने अपने शिष्य श्री गोविंदा दूबे को अभय प्रदान करने के लिए इन नौ रत्नों की रचना की थी। माना जाता है कि यह भय उनकी श्री कृष्ण भक्ति में बाधा उत्पन्न कर रहा था। श्री वल्लभाचार्य जी का उपदेश स्पष्ट है: यदि आपने स्वयं को श्री कृष्ण को समर्पित कर दिया है, तो चिंता की कोई बात ही नहीं है।

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  1. नवरत्नम् - महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य

    जिसने स्वयं को श्री कृष्ण चरणों में आत्मनिवेदन कर दिया है उसे कदापि चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि परम कृपालु भगवान अंगीकृत जीवों को लौकिक गति प्रदान नहीं करेंगे।

  2. तस्मात्सर्वात्मना नित्यं श्रीकृष्णः शरणं मम - महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य, नवरत्नम् (9)

    ऐसा महसूस करना चाहिए कि श्री कृष्ण हर जगह व्याप्त हैं एवं वे सभी की आत्मा हैं और निरंतर चिंतन करना चाहिए कि "मैं श्री कृष्ण की शरण में हूँ"। यह मेरा दृढ़ मत है।

  3. सेवाकृतिर्गुरोराज्ञा बाधनं - महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य, नवरत्नम् (7)

    गुरु की आज्ञा के अनुसार ही सेवा करनी चाहिए । परंतु यदि किसी कारणवश गुरु की आज्ञा के अनुसार सेवा न हो पाए तो उसे हरि की इच्छा ही समझना चाहिए एवं उन श्री हरि की इच्छा अनुसार ही चलना चाहिए एवं मन से सेवा करनी चाहिए और सुख में रहना चाहिए ।

  4. सर्वेषा प्रभुसम्बन्धो - महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य, नवरत्नम् (3)

    सब कुछ भगवान कृष्ण से ही सम्बंधित है और उनसे कुछ भी अलग नहीं है। इसलिए, यदि आप ऐसी गतिविधियों (या कार्यों) में संलग्न हैं जो आपको लगता है कि उनसे संबंधित नहीं हैं, तो चिंता करने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि वे वास्तव में उन्हीं से सम्बंधित हैं।

  5. चित्तोद्वेगं विधायापि हरिर्यद्यत् - महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य, नवरत्नम् (8)

    यदि किसी कारण आपके चित्त में द्वेग उत्पन्न हो रहा है तो ऐसा मान कर कि श्रीहरि जो भी करेंगे वह अच्छा ही करेंगे, यह उनकी लीला मात्र है, चिंता को शीघ्र त्याग दें ।