राग संग्रह [भारतेंदु ग्रंथावली]

राग संग्रह श्री भारतेंदु हरिशचंद्र द्वारा रचित भारतेंदु ग्रंथावली का सोलहवाँ अध्याय है जिसमें विभिन्न रागों में उत्सव, ऋतू, विहार, आदि के छंदों की रचना की गयी है।

3 लेख उपलब्ध हैं

  1. जय जय जय जय जय श्री राधा - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, राग संग्रह (38)

    श्री राधा की जय हो । जब से बरसाने में श्री राधा प्रकट हुई हैं तब से उन्होंने अपने जनों की समस्त बाधाओं का हरण कर लिया है ।

  2. जो पै श्री राधा रूप न धरतीं - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, राग संग्रह (37)

    यदि श्री राधा ब्रज-धाम में प्रकट नहीं होतीं तो जग में प्रेम-पंथ का प्राकट्य नहीं होता, ब्रजांगनाएं तब क्या करतीं ?

  3. हमरे निर्धन की धन राधा - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, राग संग्रह (136)

    मेरे जैसे निर्धन की धन तो एक मात्र श्री राधा ही हैं । अनंत कोटि साधनों का त्याग करके बस मैंने इन्हीं के चरण कमलों को आराधा [भक्ति की] है ।