जय जय जय जय जय श्री राधा - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, राग संग्रह (38)
श्री राधा की जय हो । जब से बरसाने में श्री राधा प्रकट हुई हैं तब से उन्होंने अपने जनों की समस्त बाधाओं का हरण कर लिया है ।
राग संग्रह श्री भारतेंदु हरिशचंद्र द्वारा रचित भारतेंदु ग्रंथावली का सोलहवाँ अध्याय है जिसमें विभिन्न रागों में उत्सव, ऋतू, विहार, आदि के छंदों की रचना की गयी है।
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श्री राधा की जय हो । जब से बरसाने में श्री राधा प्रकट हुई हैं तब से उन्होंने अपने जनों की समस्त बाधाओं का हरण कर लिया है ।
यदि श्री राधा ब्रज-धाम में प्रकट नहीं होतीं तो जग में प्रेम-पंथ का प्राकट्य नहीं होता, ब्रजांगनाएं तब क्या करतीं ?
मेरे जैसे निर्धन की धन तो एक मात्र श्री राधा ही हैं । अनंत कोटि साधनों का त्याग करके बस मैंने इन्हीं के चरण कमलों को आराधा [भक्ति की] है ।