श्री राधा चतुः श्लोकी

श्री राधा चतुः श्लोकी श्री विठ्ठलनाथ जी द्वारा श्री राधारानी की अनंत महिमा का सुंदर विवरण है। श्री विट्ठलनाथ जी श्री वल्लभाचार्य के छोटे पुत्र और पुष्टि मार्ग के संस्थापक थे।

4 लेख उपलब्ध हैं

  1. संविधाय दशने तृणं विभो प्रार्थये व्रजमहेन्द्रनन्दन - श्री विट्ठलनाथ जी, श्री राधा चतु:श्लोकी (4)

    हे रसिक शेखर, नंद नंदन, ब्रज शेखर आपसे पूर्णतः विनय पूर्वक एवं शपथ पूर्वक यह विनती करता हूँ कि आपकी प्राण वल्लभा श्री राधा ही जन्म जन्मांतर मेरी आराध्य देव रहें ।

  2. प्राणनाथ वृषभानुनन्दिनी श्रीमुखाब्जरसलोलषट्पद - श्री विट्ठलनाथ जी, श्री राधा चतु:श्लोकी (3)

    हे, मेरे रसिक शेखर, श्री कृष्ण, आप नित्य ही श्री राधा (श्री राधा मुख) रस में डूबे हुए हैं, मैं केवल आपकी एक उद्देश्य से आराधना करता हूँ कि मुझे ऐसा अधिकारी बना दीजिए कि श्री वृष्णभानु नंदिनी श्री राधा के चरण कमल के नीचे कुछ लेश मात्र स्थान प्राप्त कर सकूँ ।

  3. श्यामसुन्दर शिखण्डशेखर स्मेरहास्य मुरलीमनोहर - श्री विट्ठलनाथ जी, श्री राधा चतु:श्लोकी (2)

    हे मुरली मनोहर रसिक शेखर मधुर मुस्कान से सुशोभित श्याम सुंदर, मुझ पर कृपा कीजिए और अपनी प्राण प्रिया श्री राधारानी की चरण किंकरी बना दीजिए।

  4. कृपयति यदि राधा बाधिता - श्री विट्ठलनाथ जी, श्री राधा चतु:श्लोकी (1)

    यदि समस्त बाधाओं को दूर करने वाली श्री राधा रानी कृपा कर दें, तो जीव के लिए ऐसी कौन सी श्रेष्ठ मर्यादा शेष रह जाती है तीनों लोकों में, जो ह्रदय में प्रकट ना हो।