मेरी कुल पूजि तुहीं मानी - श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (41)
हे स्वामिनी! मैंने तुम्हें ही अपने कुल की पूज्या और अपनी एकमात्र ठकुरानी (स्वामिनी) माना है। मैं तुम्हें ही नित्य अपनी आँखों में और अपने हृदय में धारण करती हूँ।
रसिक जीवनी कविवर श्री मनोहर दास जी (प्रिया दास जी के गुरु) द्वारा संकलित ग्रन्थ है जिसमें विभिन्न पदों का संकलन किया गया है।
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हे स्वामिनी! मैंने तुम्हें ही अपने कुल की पूज्या और अपनी एकमात्र ठकुरानी (स्वामिनी) माना है। मैं तुम्हें ही नित्य अपनी आँखों में और अपने हृदय में धारण करती हूँ।
मैं परम पावन श्री वृन्दावन धाम की वंदना करता हूँ, जहाँ का एक छोटा सा तिनका (तृण) बनना भी ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए अत्यंत दुर्लभ है; और यह दिव्य धाम हम जैसे तुच्छ जीवों को परम विश्राम प्रदान करने के लिए सदा तत्पर रहता है।
बलिहारी है आज प्रिया-प्रियतम (श्री राधा-कृष्ण) प्रेम के हिंडोले (झूले) में झूल रहे हैं। उन्होंने नीले और पीले वस्त्र धारण किए हैं, जिनकी आभा चारों ओर छलक रही है।
उन अनन्य रसिकों को मेरा प्रणाम है जिनके ह्रदय में स्वप्न में भी युगल सरकार श्री राधा कृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं बसा हुआ है ।