शिक्षा पत्रिका

शिक्षा पत्रिका, ललित किशोरी जी द्वारा रचित ग्रंथ 'अभिलाष माधुरी' का 21वां अध्याय है, जिसमें वृन्दावन रस के साधकों के लिए मार्गदर्शक दोहे संकलित किए गए हैं।

3 लेख उपलब्ध हैं

  1. खात पियत चितवत चलत ठालें करतें काम- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, शिक्षा पत्रिका (30)

    खाते, पीते, देखते, चलते फिरते अथवा कुछ भी करते हुए, वृंदावन धाम का अखंड वास एवं श्री राधे श्याम का निरंतर भजन करना चाहिए ।

  2. शेष ओ सुरेश त्यों गणेश ईश आदि देव - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, शिक्षा पत्रिका (28)

    शेष, इंद्र, गणेश जी एवं अन्य देवता ब्रह्म पद का गान करते हैं जो सर्व सुख देने वाला है। चिंतामणि से समस्त चिंताओं का निवारण होता है एवं कल्पवृक्ष एवं कामधेनु आदि समस्त कामनाएँ पूर्ण करते हैं।

  3. आन देवसों काज ना ना किहु निंदा गोय - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, शिक्षा पत्रिका (57)

    वृंदावन के रस उपासक को श्री राधा कृष्ण के अतिरिक्त अन्य किसी देवता से कोई संबंध नहीं रखना चाहिए और न ही कभी किसी की निंदा ही करनी चाहिए। केवल युगल चरणों पर ही अनन्य विश्वास रखकर पूर्ण रूप से बेपरवाही में रहना चाहिए।