इतनौं कह्यौ हमारौ कीजे - श्री हित चतुर्भुजदास
हे प्रिया-प्रियतम! मेरी यह लघु प्रार्थना स्वीकार कीजिये। जिस प्रकार श्री वृन्दावन धाम इस भूतल पर साक्षात् सुशोभित है, उसी प्रकार आप इस परम पावन धाम को मेरे हृदय-कमल में भी प्रतिष्ठित कर दीजिये।
श्री हित चतुर्भुजदास, जिन्हें चतुर्भुजदास पाठक के नाम से भी जाना जाता है, वृंदावन के श्री राधा वल्लभ संप्रदाय के एक रसिक भक्त हैं।
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हे प्रिया-प्रियतम! मेरी यह लघु प्रार्थना स्वीकार कीजिये। जिस प्रकार श्री वृन्दावन धाम इस भूतल पर साक्षात् सुशोभित है, उसी प्रकार आप इस परम पावन धाम को मेरे हृदय-कमल में भी प्रतिष्ठित कर दीजिये।
हे प्रियाजू के धाम, वृन्दावन! आपकी जय हो। मुझे अपनी शरण में ले लीजिए, ताकि मैं सदा श्री लाड़िलीजी (श्री राधा) की सेवा में संलग्न रहूँ।
श्री कृष्ण श्री राधा के चरणों में जावक लगते हैं, उन कोमल चरणों को चूमकर हृदय से लगाते ही प्रेम-वेग से रोमांचित हो उठाते हैं एवं नेह के आँसू बहाते हैं ।
रसिक चूड़ामणि श्री कृष्ण से जहां के राजा हैं एवं सखियों की मुकुट मणि श्री राधा जहां की महारानी हैं।