श्रीनिकुञ्ज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा [निकुंज केली माधुरी]

'श्रीनिकुञ्ज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा' निकुंज केली माधुरी का नौवां अध्याय है, जिसकी रचना श्री अली माधुरी जी ने की है, जिसमें श्री श्यामाश्याम के आठ प्रहर की सेवा का वर्णन किया गया है।

5 लेख उपलब्ध हैं

  1. भुजा परस्पर अंश दे - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्रीनिकुञ्ज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा

    एक-दूसरे के कंधों पर परस्पर अपनी भुजाएँ रखे हुए, श्री राधा कृष्ण मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। रसात्मक भावों से परिपूर्ण श्री प्रिया-प्रियतम के अंग-अंग से दिव्य रस की आभा छलक रही है।

  2. श्याम रूप श्रीराधिका - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्रीनिकुञ्ज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा

    श्री राधा श्री कृष्ण का स्वरूप हैं और श्री कृष्ण साक्षात् श्री राधा का ही स्वरूप हैं। दर्शन (लीला) मात्र के लिए ये दो प्रतीत होते हैं, परंतु वास्तव में ये दोनों एक ही हैं।

  3. चाल हंस गति निरख कै सखी नयन हर्षाय - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्रीनिकुञ्ज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा (82)

    श्री प्रिया-प्रियतम की हंस-गति की मधुर चाल को देखकर सखी के नयन हर्षित हो जाते हैं और वे दोनों को अपने नयनों में उसी प्रकार बसा लेती है, जिस प्रकार चकोर के नयनों में चंद्र बसा होता है।

  4. सहचरि पलक विसारि के निरषै श्यामा श्याम - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्रीनिकुञ्ज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा (34)

    सहचरी अपनी अपलक दृष्टि से श्री श्यामा-श्याम को निहारती हैं और उनके प्रत्येक दिव्य अंग से रस-माधुरी का आनंद लेती हैं। इस प्रकार वे अपने नयन को विश्राम (आनंद) देती है।

  5. एक बार जो लेय, राधा आधा नाम को - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्रीनिकुञ्ज प्रकाश अष्टयाम मानसी सेवा (40)

    श्री राधा नाम की ऐसी अद्भुत महिमा है कि यदि कोई एक बार भी प्रेमपूर्वक श्री राधा का आधा नाम अर्थात् “रा” का ही उच्चारण करता है, तो श्यामसुंदर इतने प्रसन्न हो जाते हैं कि उसे स्वयं को ही दे देते हैं।