रूप रस मांते महा प्रेम - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त एवं सवैया (26)
जो रसिक संत श्री श्यामा-श्याम की रूप-रस माधुरी में मग्न हैं, महाप्रेम के पुंज में रंगे हुए हैं और समस्त संसारी नातों का त्याग करके मन को जीतकर अवधूत बन गए हैं।
सिद्धांत के कवित्त एवं सवैया श्री रूप सखी द्वारा उनकी वाणी में लिखे सिद्धांत के कवित्त और सवैया का संकलन है। लेखक: श्री रूप सखी
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जो रसिक संत श्री श्यामा-श्याम की रूप-रस माधुरी में मग्न हैं, महाप्रेम के पुंज में रंगे हुए हैं और समस्त संसारी नातों का त्याग करके मन को जीतकर अवधूत बन गए हैं।
प्रिया-प्रियतम की लीला भूमि श्री धाम वृंदावन की तो शोभा ही निराली है। यहाँ का कण-कण सुवर्ण तथा रत्न कणों से भी अधिक बहुमूल्य है तथा यमुना जी का स्पर्श ह्रदय में सरस रस बरसाता है।
कोई योग करता है तो कोई यज्ञ, कोई तप करता है तो कोई संयम से क्रिया, कोई मौन व्रत करता है तो कोई स्वास पर केंद्रित प्राणायाम।