सूरदास मदनमोहन

सूरदास मदनमोहन को गौड़ीय संप्रदाय का अनुयायी तथा सनातन गोस्वामी का शिष्य माना जाता है। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन मदनमोहन जी की सेवा-भक्ति में अर्पित किया, वृंदावन में निवास करते हुए भक्तिपूर्ण पदों की रचना की। उनका काल लगभग 16वीं शताब्दी के आसपास माना जाता है।

3 लेख उपलब्ध हैं

  1. दूलह मदनगोपाल राधा नव दुलही - श्री सूरदास मदनमोहन जी की पदावली (03)

    एकमात्र विशुद्ध प्रेम के वश में होकर जिन ब्रजांगनाओं ने मनमोहन श्री कृष्ण को पूरी तरह अपने अधीन कर लिया है, इसी कारण इस ब्रज की प्रेम-रीति संपूर्ण ब्रह्मांड से अत्यंत विशिष्ट और निराली है।

  2. दूलह मदनगोपाल राधा नव दुलही - श्री सूरदास मदनमोहन जी की पदावली (47)

    श्री मदनगोपाल (कृष्ण) दूल्हा हैं और श्री राधा उनकी नवल दुलहन हैं। इन दोनों की युगल छवि ऐसी सुशोभित हो रही है, मानो किसी नवीन तमाल के वृक्ष से लिपटकर कोई कंचन (स्वर्ण) की बेल विकसित होकर लहरा रही हो।

  3. पाछें ललिता, ता आगे स्यामा प्यारी - श्री सूरदास मदनमोहन (गौड़ीय संत)

    ललिता पीछे-पीछे चल रही हैं, उनके आगे प्यारी श्यामा (राधा) जू हैं, और उनसे आगे प्रियतम श्री कृष्ण मार्ग में फूल बिछाते हुए चल रहे हैं।