सूरदास मदनमोहन
सूरदास मदनमोहन को गौड़ीय संप्रदाय का अनुयायी तथा सनातन गोस्वामी का शिष्य माना जाता है। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन मदनमोहन जी की सेवा-भक्ति में अर्पित किया, वृंदावन में निवास करते हुए भक्तिपूर्ण पदों की रचना की। उनका काल लगभग 16वीं शताब्दी के आसपास माना जाता है।
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तू सुनि कान दैरी मुरली - श्री सूरदास मदनमोहन (गौड़ीय संत), श्री सूरदास मदनमोहन जी की पदावली (121)
हे राधे! तुम कान लगाकर मुरली की धुन सुनो, कुंज-भवन में श्रीश्यामसुंदर तुम्हारे ही गुणों का गान कर रहे हैं। जो पवन तुम्हारे श्रीअंग का स्पर्श करके आती है, वे उसके सम्मुख होकर उसे प्रेमपूर्वक अपने हृदय से लगा लेते हैं।
तेरह लाख सँडीले उपजे सब - श्री सूरदास मदनमोहन (गौड़ीय संत)
सूरदास मदनमोहन जी कहते हैं कि संडीला में प्राप्त तेरह लाख रुपये साधु-संतों की सेवा एवं भंडारे में समर्पित कर, वे स्वयं सब कुछ त्यागकर वृंदावन की ओर प्रस्थान कर गए। कहा जाता है कि वे अकबर के समय संडीला के राजस्व अधिकारी थे और शाही खजाने में भेजे गए संदूकों में कंकड़-पत्थर भरकर उनके भीतर यह दोहा लिख कर भिजवा दिया था। जब यह बात बादशाह अकबर तक पहुँची तो उन्होंने सूरदास मदनमोहन जी की निष्कपटता को देखते हुए उनको क्षमा कर उन्हें पुनः बुलाया, किंतु सूरदास जी राजकीय सेवा से विरक्त होकर श्रीवृन्दावन में ही रहने लगे थे।
एक प्रीति बस जिनि किये मोहन - श्री सूरदास मदनमोहन (गौड़ीय संत), सूरदास मदनमोहन जी की पदावली (03)
एकमात्र विशुद्ध प्रेम के वश में होकर जिन ब्रजांगनाओं ने मनमोहन श्री कृष्ण को पूरी तरह अपने अधीन कर लिया है, इसी कारण इस ब्रज की प्रेम-रीति संपूर्ण ब्रह्मांड से अत्यंत विशिष्ट और निराली है।
दूलह मदनगोपाल राधा नव दुलही - श्री सूरदास मदनमोहन जी की पदावली (47)
श्री मदनगोपाल (कृष्ण) दूल्हा हैं और श्री राधा उनकी नवल दुलहन हैं। इन दोनों की युगल छवि ऐसी सुशोभित हो रही है, मानो किसी नवीन तमाल के वृक्ष से लिपटकर कोई कंचन (स्वर्ण) की बेल विकसित होकर लहरा रही हो।
पाछें ललिता, ता आगे स्यामा प्यारी - श्री सूरदास मदनमोहन (गौड़ीय संत)
ललिता पीछे-पीछे चल रही हैं, उनके आगे प्यारी श्यामा (राधा) जू हैं, और उनसे आगे प्रियतम श्री कृष्ण मार्ग में फूल बिछाते हुए चल रहे हैं।