स्व नियम दशकम

स्व नियम दशकम श्री रघुनाथ दास गोस्वामी के दस स्वयं के व्रतों का संग्रह है।

4 लेख उपलब्ध हैं

  1. सदा राधाकृष्णोच्छलदतुल - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी - स्व: नियम दशकम (3)

    मैं युग के समान अति दीर्घकाल पर्यन्त विरही होते हुए भी सदा श्री राधा कृष्ण के उल्लासयुक्त अतुलनीय लीलास्थल इस ब्रजधाम को त्यागकर पूर्ण एश्वर्य से दीप्तिमान श्री यदुपति को, उनके कहने पर भी उनके दर्शन करने के लिए क्षणमात्र को भी श्री द्वारिका नहीं जाऊँगा ।

  2. अजाण्डे राधेति स्फुरदभिधया सिक्तजनयाऽनया - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी - स्व: नियम दशकम (7)

    इस ब्रह्माण्ड में जो व्यक्ति 'श्रीराधा'- इस उज्ज्वल नाम द्वारा सब मनुष्यों को प्रेम-पूर्वक नमस्कार करते हुए श्री कृष्ण का भजन करता है, अहह ! प्रतिदिन उस व्यक्ति के श्रीचरण-कमलों को धोकर मैं उस चरणामृत को अतिशय आनन्दपूर्वक हर समय पान कर मस्तक पर धारण करूँगा।

  3. य एकं गोविन्दं भजति कपटी दाम्भिकतया - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी - स्व: नियम दशकम (6)

    जो व्यक्ति केवल श्री कृष्ण की ही भक्ति करते हैं बिना श्री राधारानी के, ऐसे कपटी व्यक्तियों के मैं कभी भी समीप नहीं जाऊँगा, यह मेरा प्रन है।

  4. न चानयत्र क्षेत्रे हरितनु - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी - स्व: नियम दशकम (02)

    मैं एक क्षण के लिए भी किसी अन्य पवित्र धाम में नहीं रहूंगा, भले ही वह जगह में श्री कृष्ण की साक्षात अनुभूति क्यों न होती हो, भले ही वहां अत्यंत महान भक्त नित्य हरी कथा रस में क्यों न मुझे डुबाते हों अथवा उस हरी कथा रस का नित्य पान करते हों, किन्तु मेरी केवल और केवल यही इच्छा है कि मैं जन्म जन्मांतर ब्रज में ही रहूं, चाहे मैं अपना समय यहाँ के ग्रामीण लोगों से फ़ालतू बात करते हुए ही क्यों न व्यतीत करूँ।