तीर्थानंद
तीर्थानंद श्री नागरिदास जी की वाणी का तेरहवां अध्याय है, जिसमें ब्रज के तीर्थ स्थलों के रस की महिमा का गान है।
लेखक: श्री नागरिदास (महाराज सावंत सिंह जी)
3 लेख उपलब्ध हैं
ऐसौ बरसानों निरखि गहबर आयो प्रेम - श्री नागरीदास जी की वाणी, तीर्थानंद (28)
ऐसे दिव्य बरसाने के दर्शन कर, गह्वर वन आदि को निहारकर, हृदय में प्रेम की तरंग उमड़ पड़ी। जैसे ही इस पावन भूमि को भावपूर्वक दण्डवत प्रणाम किया और इसकी दिव्य रज में लोटा, समस्त राजसी नियम स्वतः ही छूट गए।
ज्यौं ज्यौं इत देखियत - श्री नागरीदास जी की वाणी, तीर्थानंद (01)
एक बार श्री नागरीदास जी को किसी विशेष कारण से मरुस्थल जाना पड़ा। वहाँ की निर्जन भूमि में निवास करते हुए उनके हृदय में ब्रज की गहन स्मृति जाग उठी — जैसे-जैसे मेरी दृष्टि इन भगवद-विमुख, प्रेमहीन जीवों पर पड़ती है, वैसे-वैसे ब्रजवासियों की निश्छल भक्ति और माधुर्य की स्मृति तीव्रतर होती जाती है।
गौर-साँवरे रसिक दोऊ, यह दीजे सुखरास - श्री नागरीदास जी की वाणी, तीर्थानंद (107)
हे सुख सिंधु, गौर साँवरे रसिक दंपति श्री राधा कृष्ण! मुझपर ऐसी कृपा करो कि अब मैं कभी ब्रज का वास त्याग कर कहीं और न जाऊँ ।