श्री विदग्ध माधव

श्री विदगध माधव श्री रूप गोस्वामी द्वारा लिखा गया है जिसमें वृंदावन में श्री राधा कृष्ण की लीला रस का वर्णन किया गया है। रचियता: श्री रूप गोस्वामी

3 लेख उपलब्ध हैं

  1. त्वद्वार्तोत्तर गीतगुम्फितमुखो - श्री रूप गोस्वामी, विदग्धमाधव (3.8)

    ललिता - हे राधे! श्रीकृष्ण की वंशी सदा तुम्हारे ही चरित्र का गान करती रहती है, वे तुम्हारी वेश-रचना के योग्य ही समस्त शिल्प क्रिया करते रहते हैं, समस्त गौएँ तुम्हारे नाम की हो रही हैं अर्थात्‌ गौओं को बुलाते समय वे राधे-राधे ही उच्चारण करते हैं। हे सुंदरि! श्रीकृष्ण के लिए लता समूह मण्डल यह श्रीवृन्दावन इस समय राधामय ही हो रहा है - सर्वत्र उन्हें तुम्हारा ही स्वरूप स्फुरित होता है ।

  2. पौर्णमासी-मयापि मोदकवृन्ददाना - श्री रूप गोस्वामी, विदग्धमाधव (1.59)

    पौर्णमासी जी कहती हैं - मैं लड्डू बाँटने के बहाने वृन्दावन जाती हूँ और वहाँ जाकर 'राधा'- इन दो मंगलमय अक्षरों के माधुर्य से कृष्ण के कानों को आनन्दित करूँगी ।

  3. राधा पुरः स्फुरति पश्चिमतश्च राधा - श्री रूप गोस्वामी, विदग्धमाधव (5.18)

    हा, यह क्या है! मेरे आगे राधा, मेरे पीछे राधा, मेरे बायीं ओर मेरी सेव्य राधा, मेरे दाहिनी ओर राधा, इस पृथ्वी पर भी राधा, आकाश में राधा, राधामय ही मुझे यह त्रिलोकी क्यों हो गई?