श्री युगल रस माधुरी (श्री नागरीदास)

श्री युगल रस माधुरी, श्री नागरीदास जी की वाणी का एक भाग है, जिसमें युगल रस की माधुरी का बहुत सुन्दर प्राकट्य किया गया है। लेखक: श्री नागरीदास जी

3 लेख उपलब्ध हैं

  1. नव निकुंज मन कौं अगम - श्री नागरीदास जी की वाणी, श्री जुगल रस माधुरी (2)

    नव निकुंज वन मन-बुद्धि से अगम्य है, जहाँ असंख्य कामदेव भी सेवा में तत्पर रहते हैं। वही श्री श्यामा-श्याम की दिव्य केलि-स्थली है, जहाँ प्रेम-रस का अखंड और अविच्छिन्न रंग निरंतर छाया रहता है।

  2. हरि राधा वृंदाविपिन - श्री नागरीदास जी की वाणी, श्री जुगल रस माधुरी (1)

    श्री राधा-कृष्ण वृन्दावन में नित्य ही विहार-रस बरसाते रहते हैं; अनन्त कल्प बीत चुके हैं, पर वे एक क्षण के लिए भी कभी बिछुड़ते नहीं।

  3. नित्य केली आनंद रस - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री जुगल रस माधुरी (12)

    मेरे हृदय में श्यामा-श्याम की वह युगल-जोड़ी नित्य निवास करती है, जो वृन्दावन के कुंजों के मध्य आनन्दरूप रस बरसा रही है और जो सदा नित्य-केलि में परायण है।