3 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. बृजे सख्य रसा विष्ठा सख्या - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (45, 46)

    ब्रज में सख्य रस में निमग्न श्री ललितादिक सखियाँ हैं जो श्री राधा के चरण-कमलों के बिना आधे पल का भी वियोग सहन नहीं कर सकतीं। वे श्री राधिका को ही अपना पति मानती हैं और सदा उन्हीं के आश्रय में रहकर नथ, कड़े, चूड़ियाँ, झलका आदि सौभाग्य-चिह्न धारण करती हैं।

  2. ब्रह्मानन्दैकवादा: कतिचन् - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (147)

    कोई ब्रह्मानन्द वादी हैं, तो कोई भगवद्वन्दना ( दास्य-भाव ) में ही उन्मत्त हैं। कुछ लोग गोविन्द के सख्यादि (मैत्त्रि भाव) को ही परमानन्द मानकर उसके आस्वादन में लग रहे हैं किन्तु श्रीराधा-चरण-कमलों की शोभायमान् नख-मणि ज्योति की एक किरण मात्र ही श्रीराधा-किङ्करियों के लिये अखिल सुख-चमत्कार-सार की सीमा है।

  3. किं रे धूर्त्त-प्रवर निकटं यासि न: प्राण-सख्या - मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु (190)

    ''क्यों रे धृर्त्त श्रेष्ठ ! हमारी प्राण-प्यारी सखी के निकट क्यों चला आता है ? दूर ही रह। तू नहीं जानता कि सुकुमारी बाला की कुच-तटी का स्पर्श करने मात्र से ही तू विमुग्ध हो जायगा !’' हे श्रीराघे ! इस प्रकार वाणी- चातुर्य्य के द्वारा मैं कब तुम्हारे अनुगमन-शील रसिक-नागर को दूर हटाकर, तुम दोनों के ह्रदय को विमुग्ध करूँगी?