स्वामिनि हौं पतितन शिरताज - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (81)
हे स्वामिनी, मैं पतितों में सिरताज हूँ। इस जगत में मैं तुम्हारी कहलाती हूँ, परंतु फिर भी विमुखों की भाँति इधर-उधर भटक रही हूँ और कोई लज्जा तक नहीं आती।
राग जंगला आसावारी थाट से संबंधित है और रात के तीसरे प्रहर में गाया जाता है।
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हे स्वामिनी, मैं पतितों में सिरताज हूँ। इस जगत में मैं तुम्हारी कहलाती हूँ, परंतु फिर भी विमुखों की भाँति इधर-उधर भटक रही हूँ और कोई लज्जा तक नहीं आती।
हे राधारानी मेरी लाज तो आपके हाथ है । हे सुख स्वरूपा श्यामा जू! तुम्हारे अतिरिक्त मुझे और कोई नहीं भाता ! [1]
श्री वृषभानु दुलारी, श्री राधा महारानी की बलिहारी जाता हूँ जिनका ध्यान श्री कृष्ण चंद्र भी सदा करते हैं, जिनका रूप परम उज्जवल है ।
अरी सखी, समस्त प्रकार के प्रपंचों (अर्थात् सात्विक, राजस, तामस) से मन को हटा कर श्री वृंदावन धाम से नेह कर ।
श्री सूरदास जी विनयपूर्वक शब्दों में कहते हैं कि हे प्रभु मेरे समान कुटिल, खल एवं कामी जीव विश्व में कौन होगा ? मेरे समान नमक हरामी कौन होगा क्यूँकि जिस प्रभु ने मुझे यह सुरदुर्लभ मानव देह प्रदान किया है मैंने उसको ही भुला दिया ।