राग जंगला

राग जंगला आसावारी थाट से संबंधित है और रात के तीसरे प्रहर में गाया जाता है।

5 संकीर्तन उपलब्ध हैं

  1. स्वामिनि हौं पतितन शिरताज - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (81)

    हे स्वामिनी, मैं पतितों में सिरताज हूँ। इस जगत में मैं तुम्हारी कहलाती हूँ, परंतु फिर भी विमुखों की भाँति इधर-उधर भटक रही हूँ और कोई लज्जा तक नहीं आती।

  2. प्यारी के वारने जाऊँ भान दुलारी के - श्री लक्षदास (शुक सम्प्रदाय के भक्त)

    श्री वृषभानु दुलारी, श्री राधा महारानी की बलिहारी जाता हूँ जिनका ध्यान श्री कृष्ण चंद्र भी सदा करते हैं, जिनका रूप परम उज्जवल है ।

  3. मो सम कौन कुटिल खल कामी - श्री सूरदास

    श्री सूरदास जी विनयपूर्वक शब्दों में कहते हैं कि हे प्रभु मेरे समान कुटिल, खल एवं कामी जीव विश्व में कौन होगा ? मेरे समान नमक हरामी कौन होगा क्यूँकि जिस प्रभु ने मुझे यह सुरदुर्लभ मानव देह प्रदान किया है मैंने उसको ही भुला दिया ।