राग कमोद

कामोद रमणीयवेषः सुलभ: क्रौंचप्रियः दीर्घपात्। दंडी विप्रनिभो विलोलनयनः विद्याधराणां प्रियः॥ पंचास्यो विधुसन्रिभो वलितो वाक् भस्मांगयो राजते। वेदाभ्यासरतो महामतिश्वरः रागः सदा पातु नः॥ - देवर्षि नारद, राग निरूपणम् (83) राग कमोद, राग कौशिक के पुत्र हैं और उनका रूप आकर्षक है, क्रौञ्च पक्षी (एक पक्षी जो चाँद से प्रेम करता है) के प्रिय हैं। उनकी दृष्टि बड़ी है, जो एक तपस्वी ब्राह्मण (जो सदैव भ्रमण करते हैं) के भांति अस्थिर है। उन्हें विद्याधर जनजाति प्रेम करते हैं। उनका शरीर भस्म-रंजीत है तथा भगवान शिव के शीश पर विराजमान अर्धचंद्र के समान उनकी टेढ़ी जीभ है। वह वेदों के अभ्यास में लीन, सबसे बुद्धिमान राग हैं। राग कमोद रात्रि के पहले प्रहर में गाया जाता है (6 बजे - 9 बजे)।

5 संकीर्तन उपलब्ध हैं

  1. अब तो भई राधा चरण गुलाम - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (130)

    श्री हित गोपाल दास जी कह रहे हैं की हे श्री राधा, अब तो मैं आपकी गुलाम हो गयी हूँ । आपके चरण कमलों पर मैं सदा के लिए बिक गयी हूँ, और बिना मूल्य के इनकी दासी बन गयी हूँ ।

  2. धनी धनी वृंदावन की धरनि - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (31)

    वृंदावन की भूमि धन्य धन्य है। यहां की भूमि वैकुंठ धाम से भी अनंत कोटि श्रेष्ठ है, ऐसा शुकदेव नारद मुनि इत्यादि ने वर्णन किया है।

  3. जयति नव नागरी , कृष्ण-सुख-सागरी - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (47)

    जयति नव नागरी , कृष्ण-सुख-सागरी , सकल गुन-आगरी , दीनन भोरी ! जयति हरि-भामिनि , कृष्ण-घन-दामिनी , मत्त गज-गामिनी , नव किशोरी !!