गीत गोविंद भाषा

“गीत गोविंद भाषा” श्री जयदेव गोस्वामी द्वारा रचित प्रसिद्ध संस्कृत ग्रंथ “गीत गोविंद” का एक सरल अनुवाद है, जो ब्रज भाषा में पदों और दोहों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह ग्रंथ वैशाख मास (मई) में वर्ष 1565 में रचित हुआ, जिससे श्री राधा-कृष्ण की दिव्य लीलाएँ ब्रजभाषी भक्तों के लिए सुगमता से सुलभ हो सकें।

5 लेख उपलब्ध हैं

  1. श्रीवृन्दावन रज परस - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (78)

    श्री वृन्दावन की रज का स्पर्श अत्यंत सरस, हृदय को हर्षित करने वाला और समस्त सुखों का मूल है। इसलिए श्रीधाम वृन्दावन में यमुना तट पर वास कर अपने जीवन को सफल बनाना चाहिए।

  2. वृन्दावन को नाम ले, भज वृन्दावन धाम - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (87)

    श्री वृंदावन का नाम लो, श्री वृंदावन धाम का भजन करो क्योंकि श्री वृंदावन धाम के समान त्रिलोक में विश्राम स्थल और कोई नहीं है।

  3. तन वृन्दावन वास कर धन वृन्दावन वास - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (84)

    अपने तन से वृंदावन में वास करना चाहिए, क्योंकि वृंदावन वास जीवन का अमूल्य धन है। मन को भी वृंदावन में लीन कर, प्रिया-प्रियतम की वृंदावन से संबंधित रस लीलाओं का निरंतर चिंतन करना चाहिए।

  4. श्रीवृन्दावन रस सुधा सिंधु निमज्जत जोय - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (81)

    जो व्यक्ति स्वयं को श्री वृंदावन रस रूपी अमृत-सागर में पूर्णतः डुबो देता है, उसे फिर कभी दैहिक, दैविक और भौतिक त्रितापों का स्पर्श नहीं होता।

  5. वृन्दावन की याद जो आवत है मन मांहि - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (85)

    जिस किसी को वृंदावन की याद आती है उसी क्षण श्री राधा अपने प्रियतम (श्रीकृष्ण) संग उस व्यक्ति को कृपापूर्वक स्वीकार कर उसकी सराहना करती हैं।