होली [भारतेंदु ग्रंथावली]
होली श्री भारतेंदु हरिशचंद्र द्वारा रचित भारतेंदु ग्रंथावली का चौदहवां अध्याय है जिसमें श्री राधा कृष्ण की मधुर होली लीला से सम्बंधित 79 पद संकलित हैं।
4 लेख उपलब्ध हैं
नित नित होरी ब्रज में रहौ - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, होली (79)
नित्य धाम ब्रज में होली का उत्सव नित्य-नित्य ही मनाया जाता है, जहाँ श्री हरि ब्रज की युवतियों संग आनंदपूर्वक क्रीड़ा करते हैं, और वे सदा दिव्य आनंद में मग्न रहती हैं।
चिरजीवो होरी के रसिया - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, होली (13)
हे होली के रसिया श्री कृष्ण, तुम चिर काल तक जियो। तुम नित्य मेरे संग होली खेलो जिसमें नित्य ही तुम्हारे मधुर गाली एवं हँसी होगी।
हम चाकर राधा रानी के - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, होली (11)
हम श्री राधारानी की नित्य दासी हैं । इस प्रकार मैं हमेशा निर्भय रहता हूँ और मुझे किसी भी देवी देवता या ग्रहों का भय नहीं है। यहाँ तक कि मुझे भयानक देवी का भी भय नहीं है ।
हम चाकर राधा रानी के - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, होली (11)
हम श्री राधारानी की नित्य दासी हैं । हम हमेशा श्री जुगल किशोर की सेवा में उपस्थित हैं ।