जय जय श्री ललिता ललित - श्री वंशी अलि, श्री ललिता मंगल (5)
श्री ललिता जी की जय हो, जो सदैव युगल (श्री राधा कृष्ण) के आनंद को बढ़ाने वाली हैं। वे कीर्ति-नंदिनी, श्री राधा को अपना जीवन-प्राण मानती हैं।
श्री ललिता मंगल श्री वंशी अलि जी द्वारा रचित ग्रंथ है जिसमें उन्होंने अपनी गुरु श्री ललिता सखी का मंगल महिमा गान किया है ।
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श्री ललिता जी की जय हो, जो सदैव युगल (श्री राधा कृष्ण) के आनंद को बढ़ाने वाली हैं। वे कीर्ति-नंदिनी, श्री राधा को अपना जीवन-प्राण मानती हैं।
श्री ललिता जी के दिव्य चरण कमलों में नूपुर अलंकृत हैं एवं उनके नख (नाखून) की कांति चन्द्र के समान उज्जवल है।
आनंद की निधि श्री ललिता सखी श्री राधा का ही अभिन्न स्वरूप हैं जिन्होंने अपनी ही [राधा की ही] भक्ति करने के लिए दो रूप धारण किए हैं (अर्थात् श्री राधा ने स्वयं की ही सहचरी भाव से भक्ति करने के लिए अपना ललिता रूप बनाया है)।
श्री ललिता जी की जय हो जिनका निज आनंद कोई और नहीं स्वयं श्री राधा हैं जिन्हें वे बड़े ही प्रेम से लाड़ लड़ाती हैं।
समस्त तत्त्वों का सार यदि श्री श्यामा-श्याम का युगल-विहार है, तो उसका भी परम सार कीरति सकुँवारी श्री राधा हैं।