मंगल [निकुंज केली माधुरी]
'मंगल' निकुंज केली माधुरी का चौबीसवां अध्याय है, जिसकी रचना श्री अली माधुरी जी ने की है, जिसमें रंग महल में प्रातः मंगला समय के श्री श्यामाश्याम की मधुर लीलाओं का वर्णन किया गया है।
4 लेख उपलब्ध हैं
जय राधा जय राधा राधा - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्यामा जू की विनय पत्रिका, मंगल
श्री राधा की जय हो, जय हो, जय हो, जिनके गौर अंग की छवि बड़ी सुन्दर है, एवं जो चरण नख से शिखा पर्यन्त सुन्दर रूप माधुरी की अगाध सागर हैं, जिसको देखकर सबके मन को मोहनेवाले श्री श्यामसुंदर के नयनों को बहुत सुख मिलता है।
मेरी सरबस जीवन प्यारी - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, मंगल (12)
मेरी जीवन सर्वस्व श्री राधा प्यारी हैं, जिनके दर्शन में एक पलक के अंतराल से ही श्री कृष्ण अति विह्वल हो जाते हैं ।
श्यामा प्यारी जय जय श्रीराधा - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, मंगल (14)
श्यामा प्यारी श्री राधा की जय हो जो करुणा की सागर हैं, समस्त गुणों का भण्डार हैं, एवं जिनका रूप अत्यंत सुंदर एवं अगाध है ।
जय जय विपन विहारनि रानी - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, मंगल (11)
वृन्दावन विहारिणी श्री राधा की जय हो, जिनकी करुणा दृष्टि से क्षण भर में ही कर्म बंधन एवं भ्रम रुपी अंधकार नष्ट हो जाता है ।