प्रातः स्मरण स्त्रोत

प्रात: स्मरण स्त्रोत जगद्गुरु आद्य निम्बार्काचार्य द्वारा रचित नौ श्लोकों का संकलन है जो भोर में स्मरण किए जाते हैं।

5 लेख उपलब्ध हैं

  1. सच्चिन्तनीयमनुमृग्यमभीष्टदोहं - जगद्गुरु आद्यनिम्बार्काचार्य, प्रात: स्मरण स्तोत्र (9)

    ब्रह्मादि देवों द्वारा अन्वेषण किये जाने वाले अथवा विविध साधना दारा अन्वेषण करने योग्य, अभिमत फल को देने वाले संसार के समस्त तापों के शमन अर्थात नाश करने वाले परमोत्तम परम रमणीय सम्यक् प्रकार से ध्यान करने योग्य भगवान् श्रीश्यामसुन्दर के चरण-कमलों को मन, वाणी तथा प्रणय पूर्वक शरीर से सेवन करता हूँ ।

  2. प्रातर्भजामि शयनोत्थितयुग्मरूपं - जगद्गुरु आद्यनिम्बार्काचार्य, प्रात: स्मरण स्तोत्र (3)

    शयन से उठे हुए ऐसे श्रीराधा-माधव युगल स्वरूप का मैं प्रातःकाल भजन करता हूँ जिनकी पारस्परिक रस लीलाएँ एवं केलि विहार के चिह्न आदि सखियों के अवलोकन का विषय हैं, जो सर्वेश्वर, सुखप्रद, रसिक-भक्तों का परमाश्रय, सहचरीवृन्द से आवृत तथा सुरत काम की क्रीड़ाओं से मन का हरण कर रहे हैं ।

  3. प्रातर्धरामि हृदयेन हृदीक्षणीयं - जगद्गुरु आद्यनिम्बार्काचार्य, प्रात: स्मरण स्त्रोत (5)

    व्रजसुन्दरियों (की अनन्य प्रीतिके कारण उन) — के प्राप्यरूप तथा उनके द्वारा प्रभातवेला में जगाये जाते हुए, सभी प्रकार की वेष-रचनाओं से समन्वित हुए जो चिन्तन का विषय बनते हैं, जो निरतिशय सौन्दर्य के आश्रय तथा (भक्तों के द्वारा) अन्त:करण में निरन्तर चिन्तनयोग्य हैं — ऐसे उन राधा-माधव के युगल स्वरूप का मैं प्रातःकाल अपने हृदय में ध्यान करता हूँ ।

  4. प्रातर्नमामि वृषभानुसुतापदाब्जं - जगद्गुरु आद्यनिम्बार्काचार्य, प्रात: स्मरण स्त्रोत (8)

    भम्रर रूपी व्रजगोपियों के नेत्र समूह जिनकी स्तुति करते हैं और परम चतुर प्रेमाकुल नन्दनन्दन श्रीहरि जिनकी सदा वन्दना करते हैं, ऐसे श्रीवृषभानुसता श्री राधिकाजी के उन चरण कमलों को मैं प्रातः काल नमन करता हूँ ।

  5. प्रात: स्मरामि युग-केलिरसाभिषिक्तं - जगद्गुरु आद्यनिम्बार्काचार्य, प्रात: स्मरण स्त्रोत (1)

    नित्यनिकुञ्जबिहारी युगलकिशोर श्री राधा कृष्ण के परम दिव्य लीलाविहार केलि रस से अभिषिक्त तथा कलिन्दतनया श्रीयमुना के गम्भीर धारा प्रवाह से सर्वदा समन्वित एवं अपने दिव्यातिदिव्य लोकोत्तर अनिर्वचनीय गुण समूह से प्रकाशमान, श्री युगल प्रिया-प्रियतम के ललित चरणारर्विन्द रज रेणु कणिका से जहां के समस्त प्राणीमात्र परम पवित्र हैं ऐसे कल्पवृक्ष स्वरूप परम सुंदर परम रमणीय श्री वृन्दावन धाम का मैं प्रात:काल स्मरण करता हूँ।