श्री राधिका महारास

श्री राधिका महारास, श्री वंशी अलि जी द्वारा रचित ग्रंथ है ।

6 लेख उपलब्ध हैं

  1. इतनी कहि हिय विवस ह्वै रुदन कियौ ब्रजवाल - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (14)

    श्री राधा और सखियों के महारास-विलास में, जब श्री राधा रानी सहसा अंतर्धान हो गईं, तब समस्त ब्रजवालाएँ उनके विरह में पूर्णतः भाव-विह्वल हो उठीं। इतना कहकर वे हृदय से विवश हो गईं और आर्त होकर रुदन करने लगीं। जैसे ही उन्होंने अश्रु-पूरित नेत्रों से अपनी प्राण-प्रिया श्री राधा को रो कर पुकारा, ठीक उसी क्षण, मुख-कमल पर मंद-मंद मुस्कान बिखेरती हुई श्री राधा जू वहाँ साक्षात् प्रकट हो गईं।

  2. अति अलवेली भाँति सौं लई मुरलिका हाथ - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (5)

    जब श्री राधा ने अत्यंत अलबेली और मोहक रीति से अपने करकमलों से वंशी उठाकर अपने होठों से मधुर स्वर में वंशी वादन किया, तो उसकी स्वर-माधुरी से वृंदावन के समस्त स्थिर और चल प्राणी प्रेम विभोर हो गए। सभी के मन मानो खिंचकर श्री राधा के वशीभूत हो गए।

  3. मंडल रास रच्यौ बिमल निर्तति कुँवरि सुजान - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (10)

    जब श्री राधा ने रास मंडल में प्रत्येक गोपी के संग नृत्यमय रास रचाया, तब ब्रज-बालाओं को वास्तविक आनंद की परम अनुभूति हुई। उस दिव्य रासलीला के अद्भुत प्रेमरस में डूबकर सभी गोपियों ने अपने प्राणों को बार-बार श्री राधा पर न्योछावर कर दिया।

  4. तुही एक राधा कुँवर दृग दरशत नहिं और - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (6)

    हे श्री राधा! केवल आप ही मेरे जीवन का सर्वस्व हैं । मेरे नेत्र आपके अतिरिक्त किसी अन्य के दर्शन की चाह नहीं रखते। हे रसिक शिरोमणि! इसी कारण मैं केवल आपका ही अनन्य भजन करती हूँ ।

  5. छकन छके जे राधिका, तिनहें न और सुहाय - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (2)

    जो उपासक श्रीराधिका के रस में छक गए हैं, उन्हें और कोई रस सुहाता नहीं। जैसे अंगूर का स्वाद चखने के बाद कोई नीम का फल नहीं खाता।

  6. हौं दासी बिन मोल की, तुम्हरी हौं सुकुँवारि - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास

    वंशी अलि जी के रास लीला से सम्बंधित काव्यों में गोपियों का श्री राधा के प्रति प्रियतम भाव है, उनकी उपासना में श्री कृष्ण का न के बराबर स्थान है । श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि जब श्री राधा से महारास गोपियाँ कर रही थी, तब श्री राधा महारास से आलक्षित हो जाती हैं और सब गोपियाँ रुदन करती हैं । तभी श्री राधा से उनकी एक अंतरंग सखी कहती है: हे श्री राधा, मैं तो तुम्हारी बिना मोल की दासी हूँ। हे सुकुँवरि मैं तो सदा से तुम्हारी ही हूँ । हे मेरी प्रतिपाल, अब तुम ही मेरे से नेह निभाओ ।