श्री राधिका महारास
श्री राधिका महारास, श्री वंशी अलि जी द्वारा रचित ग्रंथ है ।
8 लेख उपलब्ध हैं
मन तन दृग राधा गहे - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (13)
श्रीराधा ने मेरे मन, शरीर और नेत्रों को पूरी तरह से अपने वश में कर लिया है, जिसके कारण अब मुझे किसी अन्य वस्तु या परिस्थिति की कोई सुधि नहीं रही है। हृदय में विरह का ऐसा तीव्र कोलाहल और व्याकुलता मची हुई है कि मन में जो कुछ भी उमड़ता है, मैं उन्मादवश वही बकने लगता हूँ।
अहो कुँवरि तुब रूप यह - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (5)
हे किशोरी जी (श्रीराधा)! आपका यह अनुपम सौन्दर्य किसी भी मर्यादा का पालन नहीं करता। आपकी स्मृति मुझे अपनी सुध-बुध भुला देती है और मेरे हृदय के मर्मस्थल को प्रेम-बाणों से निरन्तर बींधती रहती है।
इतनी कहि हिय विवस ह्वै रुदन कियौ ब्रजवाल - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (14)
श्री राधा और सखियों के महारास-विलास में, जब श्री राधा रानी सहसा अंतर्धान हो गईं, तब समस्त ब्रजवालाएँ उनके विरह में पूर्णतः भाव-विह्वल हो उठीं। इतना कहकर वे हृदय से विवश हो गईं और आर्त होकर रुदन करने लगीं। जैसे ही उन्होंने अश्रु-पूरित नेत्रों से अपनी प्राण-प्रिया श्री राधा को रो कर पुकारा, ठीक उसी क्षण, मुख-कमल पर मंद-मंद मुस्कान बिखेरती हुई श्री राधा जू वहाँ साक्षात् प्रकट हो गईं।
अति अलवेली भाँति सौं लई मुरलिका हाथ - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (5)
जब श्री राधा ने अत्यंत अलबेली और मोहक रीति से अपने करकमलों से वंशी उठाकर अपने होठों से मधुर स्वर में वंशी वादन किया, तो उसकी स्वर-माधुरी से वृंदावन के समस्त स्थिर और चल प्राणी प्रेम विभोर हो गए। सभी के मन मानो खिंचकर श्री राधा के वशीभूत हो गए।
मंडल रास रच्यौ बिमल निर्तति कुँवरि सुजान - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (10)
जब श्री राधा ने रास मंडल में प्रत्येक गोपी के संग नृत्यमय रास रचाया, तब ब्रज-बालाओं को वास्तविक आनंद की परम अनुभूति हुई। उस दिव्य रासलीला के अद्भुत प्रेमरस में डूबकर सभी गोपियों ने अपने प्राणों को बार-बार श्री राधा पर न्योछावर कर दिया।
तुही एक राधा कुँवर दृग दरशत नहिं और - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (6)
हे श्री राधा! केवल आप ही मेरे जीवन का सर्वस्व हैं । मेरे नेत्र आपके अतिरिक्त किसी अन्य के दर्शन की चाह नहीं रखते। हे रसिक शिरोमणि! इसी कारण मैं केवल आपका ही अनन्य भजन करती हूँ ।
छकन छके जे राधिका, तिनहें न और सुहाय - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (2)
जो उपासक श्रीराधिका के रस में छक गए हैं, उन्हें और कोई रस सुहाता नहीं। जैसे अंगूर का स्वाद चखने के बाद कोई नीम का फल नहीं खाता।
हौं दासी बिन मोल की, तुम्हरी हौं सुकुँवारि - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास
वंशी अलि जी के रास लीला से सम्बंधित काव्यों में गोपियों का श्री राधा के प्रति प्रियतम भाव है, उनकी उपासना में श्री कृष्ण का न के बराबर स्थान है । श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि जब श्री राधा से महारास गोपियाँ कर रही थी, तब श्री राधा महारास से आलक्षित हो जाती हैं और सब गोपियाँ रुदन करती हैं । तभी श्री राधा से उनकी एक अंतरंग सखी कहती है: हे श्री राधा, मैं तो तुम्हारी बिना मोल की दासी हूँ। हे सुकुँवरि मैं तो सदा से तुम्हारी ही हूँ । हे मेरी प्रतिपाल, अब तुम ही मेरे से नेह निभाओ ।