रस के पद [श्री चतुर दास जी]

रस के पद, ग्रंथ श्री चतुर दास जी की वाणी में श्री चतुर दास द्वारा लिखित रस के पदों का संकलन है। रचैयता: श्री चतुर दास जी

4 लेख उपलब्ध हैं

  1. श्रीवृन्दावन सहज समाज - श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, रस के पद (2)

    अरी सखी, श्रीधाम वृन्दावन की स्वाभाविक शोभा-सम्पत्ति भी बड़ी मनोहारी है। यह नित्य है, इसका त्रिकाल में कभी विनाश नहीं होता। यह समस्त मायिक दोषों से रहित है और इसी भूतल पर सुशोभित हो रहा है। मणिमाणिक्यों से रचित खचित यहाँ की भूमि बड़ी सुन्दर है।

  2. प्रियालाल देखि मन फूले - श्री चतुर दास जी की वाणी, रस के पद (3)

    लाल (श्री कृष्ण) प्रियाजू (श्री राधा) को देखकर फूले नहीं समा रहे हैं । वे उन्हें बार-बार देख कर आनन्दित हो रहे हैं और उनके रूप रसासव का पान कर अद्भुत सुख सिंधु में हिलोरें ले रहे हैं ।

  3. आजु की शोभा कही न जाइ - श्री चतुर दास जी की वाणी, रस के पद (4)

    अरी सखी, आज की शोभा किस भांति अभिव्यक्त करूं, कहने में नहीं आ रही है। स्वामी श्री हरिदास जी, श्री वीठल विपुलदेवजी, श्री विहारिनदेवजी, श्री सरसदासजी एवं श्री नागरीदासजी श्री प्रियाजी (श्री राधा) की रूप माधुरी का गान कर रहे हैं ।

  4. आजु महा मंगल मन माई - श्री चतुर दास जी की वाणी, रस के पद (1)

    हे सखी, आज मेरा मन महान आनंद को प्राप्त हो रहा है क्योंकि श्री प्रिया प्रियतम दोनों अत्यंत आनंद में भर अपनी रुचि के अनुसार केली विलास (क्रीड़ा) कर रहे हैं।