श्रीवृन्दावन सहज समाज - श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, रस के पद (2)
अरी सखी, श्रीधाम वृन्दावन की स्वाभाविक शोभा-सम्पत्ति भी बड़ी मनोहारी है। यह नित्य है, इसका त्रिकाल में कभी विनाश नहीं होता। यह समस्त मायिक दोषों से रहित है और इसी भूतल पर सुशोभित हो रहा है। मणिमाणिक्यों से रचित खचित यहाँ की भूमि बड़ी सुन्दर है।
