रस की साखी [श्री रसिक देव]
रस की साखी, ग्रंथ श्री रसिक देव जी की वाणी में हरिदासी सम्प्रदाय के श्री रसिक देव द्वारा लिखित रस के दोहों का संकलन है।
8 लेख उपलब्ध हैं
पुरुष भाव धीरि लाल पै त्रिया भाव करि प्रिय - श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (13)
प्रियतम लाल (श्रीकृष्ण) में ही एकमात्र पुरुष भाव को रखकर तथा स्वयं में उनके प्रति 'त्रिया भाव' (सखी या गोपी भाव) धारण करके, युगल सरकार के पारस्परिक लाड़-विहार और उनके 'तत्सुख' (केवल उनके सुख के लिए) की प्राप्ति हेतु युगल प्रेम में सर्वथा निष्ठावान और स्थिर होना चाहिए।
मंद हँसनि मुख कमल की - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (7)
अपने मुख-कमल पर मंद-मंद मुस्कान एवं तिरछी चितवन से मेरी ओर निहार कर, श्री राधा ने मुझे अपने वश कर, मेरे प्राणों का हरण कर लिया।
रसिक बिहारी सौं बनी - श्री रसिक देव जी की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (16)
मेरी रसिक बिहारी से ऐसी बनी हुई है कि वे पल भर को भी मेरा साथ नहीं छोड़ते, जिसे देखकर मुझे आश्चर्य होता है कि ये वन में रास रचाने कब जाते होंगे।
रसिक रसीली बात सों - श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (2)
जब श्री राधा विहार-लीला में मान धारण करती हैं, तब रसिकवर श्री लाल जी उनकी ओर मुख कर, मधुर एवं रसीली बातों से उन्हें मनाने का प्रयास करते हैं और नयनों के संकेत से ही प्रणाम कर विनयपूर्वक प्रार्थना करते हैं।
पुरुष भाव छूटै नहीं, मन में बस रही जोई - श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (12)
सखी भाव एक दिव्य भाव है जिसका प्रादुर्भाव बिना निर्विकार हुए नहीं होता, जहाँ जीव लौकिक कर्मों एवं संबंधों से सर्वप्रथम अनासक्त हो जाता है, जहाँ वह न तो स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक।
रसिक निमिष नहिं बीछुरैं, ना दुरि बैठें और - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (1)
हमारे रसिक बिहारी-बिहारिनी एक क्षण के लिए भी परस्पर से अलग नहीं होते और कहीं दूर भी नहीं बैठते। इस दिव्य विहार में मान केवल इतना-सा होता है कि नयनों की कोर से हलका-सा दुराव प्रकट हो जाता है।
खटकौ नहीं उसास को - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (10)
श्री रसिक देव जी को न जीवन-मरण की चिंता है, न ही सांसारिक संबंधों का आकर्षण। उनके मन में तो गौर-साँवले श्री राधा-कृष्ण ही बसे हैं; चाहे लाख लोग आएँ या चले जाएँ, उन्हें इसकी कोई चिंता नहीं।
मन सीसी राधा अतर - श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (8)
मेरे मन-रूपी शीशी में श्री राधा-रूपी इत्र नख-शिख तक भरा हुआ है। उसे देखकर साँवरे श्री कृष्ण भँवरे के समान मोहित होकर उससे लिपटे रहते हैं।