संभ्रम-मानलीला

संभ्रम-मानलीला 'ब्रज विहार' का पंद्रहवां अध्याय है जो निम्बार्क संप्रदाय के श्री नारायण स्वामीजी द्वारा रचित है जिसमें मान लीला से संबंधित पद संकलित हैं ।

4 लेख उपलब्ध हैं

  1. मोहि मति रोकै री तू एरी ब्रज नागरी - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मानलीला (11)

    जब श्री कृष्ण माननी श्री राधा से मिलने पहुंचते हैं तो श्री राधा की एक सखी उन्हें भीतर प्रवेश करने से रोक देती हैं ।

  2. प्यारी जी तिहारे बिन कल न परत है - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मानलीला (16)

    हे प्यारी जू [श्री राधा], आपके बिना मुझे एक क्षण को भई चैन चैन नहीं मिलता। मंदिर, अटारी, सुंदर चित्रों से सजी फुलवारी—इनमें से कोई भी मुझे प्रिय नहीं लगता।

  3. सखि नँदलाल न आवन पावै - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मानलीला (5)

    श्री राधारानी सखी से कहतीं हैं कि हे सखी, देखना नन्दलाल (श्री कृष्ण) आने न पायें । चाहे जितना तुम्हें अनुनय-विनय करें लेकिन मेरे महल के भीतर चरण रखने नहीं देना ।