श्री सेवक जी

श्री सेवक जी महाराज (दामोदर दास ), वृंदावन के एक रसिक संत, श्री हित हरिवंश महाप्रभु के शिष्य हैं।

8 लेख उपलब्ध हैं

  1. राधा वल्लभ भजत भजि भली भली सब होय - श्री सेवक जी, सेवक वाणी (10.2)

    श्री राधा वल्लभ लाल जी का भजन करने वालों का भजन करने से सब प्रकार से भला होता है । अपने सजातीय रसिक अनन्यों का भजन करने से सब प्रकार का भला होता है ।

  2. नाम-वाणी निकट श्याम-श्यामा प्रगट - श्री सेवक जी, सेवक वाणी (4.18)

    श्री हरिवंश नाम और वाणी के निकट श्री श्याम श्यामा, श्री हरिवंश चन्द्र की उनके (श्री श्याम श्यामा के) प्रति अनुपम प्रीति पर रीझकर, सदैव प्रकट रहते हैं ।

  3. श्री हित महल - वृंदावन

    श्री हित महल हिताश्रम सत्संग भूमि का एक भाग है जिसकी स्थापना राधावल्लभीय संत श्री हितदास जी ने 1955 में किया था ।

  4. श्रीहरिवंश सु रीति सुनाऊँ - श्री दामोदरदास (सेवक जी), श्री सेवक वाणी (4.7)

    श्री सेवक जी कहते हैं "अब मैं श्री हरिवंश की रसोपासना की सुन्दर परिपाटी सुनाता हूँ जिसमें श्यामाश्याम का एक साथ गान किया जाता है। इन दोनों में एक क्षण का भी अन्तर नहीं होता।

  5. सुभग सुन्दरी सहज सिंगार - श्री सेवक जी (दामोदर दास) - श्री सेवक वाणी

    परम सुंदरों में भी सुंदर, स्वाभाविक श्रृंगार, स्वाभाविक शोभा एवं सर्वांग प्रति सहज रूप लावण्यमयी श्रीवृषभान नंदिनी हैं । आप सहज (स्वाभाविक) आनन्द की समूह एवं विपिनराज श्रीवृन्दावन में नित्य उदित स्वाभाविक चन्द्रिका हैं- अनन्त ज्योति हैं ।

  6. निरखत नित्य विहार, पुलकित तन रोमावली - श्री सेवक जी, श्री सेवक वाणी

    नित्य विहार का दर्शन हो रहा हो, सम्पूर्ण शरीर आनंद से पुलकित हो रहा हो, रोमांचित हो, नेत्रों से आनंद के आंसू बह रहे हो, यह ही श्री हित हरिवंश महाप्रभु की वास्तविक कृपा है।

  7. श्री सेवक जी (दामोदर दास) - वृन्दावन के रसिक संत

    श्री सेवक जी का चरित्र बड़ा रहस्यमय है क्यूंकि उन्होंने श्री हितहरिवंश जी का कभी साक्षात्कार नहीं किया पर वह उनके सबसे बड़े कृपापात्र थे। उन्होंने उनके उपदेश नहीं सुने परंतु वह उनके सिद्धांत के सबसे बड़े जानकार थे। वह वृंदावन में केवल 10 दिन रहे पर राधावल्लभ संप्रदाय में उन्हें जो स्थान प्राप्त है वह श्री हित हरिवंश जी के शिष्य परंपरा में किसी को नहीं है इसका प्रमाण यह है कि उनकी वाणी आजतक स्वयं श्री हित हरिवंश जी की वाणी श्री हित चौरासी के साथ लिखी और पढ़ी जाती है।