आदि जगद्गुरु शंकराचार्य

आदि शंकराचार्य (संस्कृत: आदि शंकराचार्य) एक 8 वीं शताब्दी के भारतीय दार्शनिक और धर्मशास्त्री थे जिन्होंने अद्वैत वेदांत के सिद्धांत को प्रशस्त किया। उन्हें हिंदू धर्म में विचार की मुख्य धाराओं को एकजुट करने और स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है।

5 लेख उपलब्ध हैं

  1. श्रद्धाभक्त्योरभावेपि भगवन्नामसंकीर्तन - जगद्गुरू शंकराचार्य, शांकरभाष्य (14)

    मन में श्रद्धा भक्ति न भी हो तो भी भगवान के नाम का संकीर्तन सब पापों का नाश कर देता है, फिर यदि श्रद्धा हो तब तो बात ही क्या है।

  2. कदा वृन्दारण्ये तरणि तनया पुण्य पुलिने - जगद्गुरु श्री शंकराचार्य

    वह ऐसा सुन्दर अवसर कब प्राप्त होगा जब कि श्री यमुना जी के तट पर श्री वृंदावन में श्री श्याम सुन्दर गोपाल लाल का स्मरण करते हुए मेरे दिन निमिष की भाँति व्यतीत होंगे ।

  3. अलं विषय वार्तया नरक कोटि वीभत्सया - राधा सुधा निधी -83, हित हरिवंश महाप्रभु

    विषय-चर्चा बहुत हो चुकी, इसे बन्द करो क्योंकि यह कोटि-कोटि नरकों के समान घृणित है । श्रुति-कथा भी व्यर्थ श्रम ही है । अहो हमें तो कैवल्य मुक्ति से भय प्रतीत होता है (क्योंकि वह नाम-रूप रहित है)। परम पुरुष भगवान् के भजन में उन्मत्त यदि कोई शुक आदि हैं, तो रहने दो; हमें उनसे क्या प्रयोजन हमारा मन तो केवल श्रीराधा के पद रस में ही डूबा रहे। (यह अभिलाषा है।)

  4. यमुना निकट तटस्थित वृन्दावन - जगद्गुरु शंकरचार्य

    श्री यमुना जी के तट पर स्थित वृन्दावन की किसी अति मनोहर वाटिका में कल्पवृक्ष के नीचे की भूमि पर चरण पर चरण रखे श्री कृष्ण बैठे हैं, जो नवीन बादलों के सदृश श्याम वर्ण के हैं, पीताम्बर पहने हुए हैं एवं सारे शरीर में कपूर से मिश्रित चन्दन का लेप किये हुए हैं। जिनके कर्ण पर्यन्त बड़े-बड़े नेत्र हैं, कानों में सुन्दर कुण्डल सुशोभित हैं, मुखारविन्द मन्द मन्द मुस्करा रहा है । जिनके वक्षस्थल पर कौस्तुभमणियुक्त सुन्दर मालायें सुशोभित हो रही हैं।