श्री युगल रस माधुरी (रसिक गोविंद रचित)

श्री युगल रस माधुरी, श्री रसिक गोविंद द्वारा रचित है, जिसमें लगभग 200 दोहे हैं, जो युगल रस की अनुपम माधुरी को समर्पित हैं।

5 लेख उपलब्ध हैं

  1. श्रीवृन्दावन सघन सरस-सुख - श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी, दोहा (4)

    दिव्य श्रीवृन्दावन धाम सघन और सरस रस की खानी है, जिसकी छटा चारों ओर छा रही है। इन्द्र के नन्दनवन जैसे कोटि-कोटि वन श्रीवृन्दावन को निहारकर लज्जित हो रहे हैं, अर्थात् वृन्दावन की शोभा उससे अनंत गुना अधिक श्रेष्ठ है।

  2. यह अगाध निधि मधुर रस - श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी, दोहा (1)

    प्रिया प्रियतम के इस अथाह मधुर रस रूपी निधि की छवि का वर्णन करना असंभव है। चटक रूपी मन सम्पूर्ण रस का पान करना चाहता है, परंतु एक बूंद ही उसे पूर्ण रूप से रस में डुबा देती है ।

  3. कृपासिन्धु आनन्दकन्द दम्पति रसभीने - श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी (2)

    हे कृपा के सागर, आनंदकंद, और सदा रस में मग्न दिव्य युगल (श्री राधा-कृष्ण)! आपकी अनंत कृपा ने मेरे जैसे असंख्य मूर्खों और पतितों का उद्धार किया है।

  4. जिनके यह रससार - श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी (197)

    जिनके ह्रदय में श्रीधाम वृंदावन का यह सार रस समा गया है, उन्हें किसी अन्य रस की चर्चा सुनना भी सुहाता नहीं है। ऐसे रसिक भक्त नित्य ही इस रस में उन्मत्त रहते हैं और स्वप्न में भी अन्य किसी रस का पान नहीं करते।

  5. जे जन रसिक चकोर, मीन चातक व्रत धारी - श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी (196)

    इस रस मार्ग में चलने के अधिकारी केवल वे रसिक जन हैं जो चकोर, मीन एवं चातक के समान अनन्य व्रत को धारण करते हैं । अनन्यता से विहीन अन्य जीव इस रस मार्ग के अधिकारी नहीं हैं।