सुधर्म बोधिनी

सुधर्म बोधिनी श्री हित लाड़लीदास द्वारा रचित ग्रंथ हैं जिसमें श्री हित रस उपासना के रहस्यों को छंदों के माध्यम से विवेचन किया गया है जिसको छह अध्यायों में विभाजित किया है।

5 लेख उपलब्ध हैं

  1. गौर देत नित सर्व सुख श्याम रूप ह्वै लेत - श्री लाड़लीदास, सुधर्म बोधिनी (4.3)

    श्री “राधा” नाम में रा और धा दो अक्षर हैं । रा दाने धातु का अर्थ है देना और धा का अर्थ है धारण करना । अत: गौर श्री राधा नित्य सर्व सुख देने वाली हैं और घनश्याम सब सुखों को लेने वाले हैं । अत: रसिकों ने राधा नाम को युगल नाम ही माना है ।

  2. गौर श्याम रस सिन्धु में केलि तरंग अपार - श्री लाड़लीदास, सुधर्म बोधिनी (4.37)

    गौर और श्याम (श्यामा-श्याम) रस के अगाध सिंधु हैं, जिसमें नित्य-विहार की अनंत केली तरंगें हिलोरें लेती हैं। रसिक जन युगों से इनके इसी पावन यश का गायन करते आए हैं, कर रहे हैं और अनंत काल तक करते रहेंगे।

  3. प्रगट महल वृंदाविपिन महली श्यामा श्याम - श्री लाड़लीदास, सुधर्म बोधिनी (1.92)

    साधक को यह अटूट भाव हृदय में धारण करना चाहिए कि यह वृंदावन ही श्रीश्यामा-श्याम का साक्षात निकुंज-महल है, जहाँ के समस्त नर-नारी उनकी अष्टयाम सेवा में निरंतर रत रहने वाले सेवक हैं।

  4. ‘रा’ अक्षर श्रीगौरतन ‘धा’ अक्षर घनश्याम - श्री लाड़लीदास, सुधर्म बोधिनी (4.2)

    ‘राधा’ नाम के गूढ़ रहस्य को प्रकट करते हुए श्री लाड़लीदास कहते हैं कि ‘रा’ अक्षर साक्षात् श्री गौरवर्णा श्री प्रिया जी (राधा रानी) का स्वरूप है और ‘धा’ अक्षर स्वयं श्यामवर्ण घनश्याम (श्री कृष्ण) का प्रतीक है। इन दोनों स्वरूपों की सहज और परस्पर अटूट प्रीति ही ‘राधा’ नाम में समाहित है, जो वास्तव में एक ही प्राण और दो देह का साक्षात् मिलन है।