श्री स्वामिनी जी ध्यानम्

श्री स्वामिनी जी ध्यानम् श्री विठ्ठलनाथ जी (गुसाईं जी) द्वारा लिखित हैं जिसमें श्री राधिका के रूप ध्यान को समर्पित दोहे पिरोए गए हैं ।

8 लेख उपलब्ध हैं

  1. आह्लादामृतवर्षिणीं भगवतीं - श्री विट्ठलनाथ जी, श्री स्वामिनी जी ध्यानम् (8)

    श्री राधा प्रेम रस का वर्षण करने वाली भगवदी स्वामिनी हैं एवं सब के द्वारा परम पूजनीय चिंतामणि हैं । वे श्री कृष्ण को आकर्षण करने वाली उनकी प्रियतमा हैं जो श्री कृष्ण को प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं । श्री राधा, श्री कृष्ण के प्रेम का वर्धन करने वाली, रस की अधिष्ठात्री हैं जो उन्हें क्रीड़ा रस के आस्वादन से पोषण करती हैं । मैं सुख का वर्धन करने वाली, सौंदर्य की सीमा, स्वामिनी श्री राधा का नमन करता हूँ जिनको नित्य निरंतर कृष्ण के नाम एवं गुण रुचिकर हैं ।

  2. श्रीराधां रसकेश्वरीं प्राणयिनीं सर्वांङ्गभूषावृताम् - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामीनी जी ध्यानम (6)

    श्री राधा रसिक संतों की ईश्वरी हैं, जो भगवान कृष्ण की प्राण-प्रिय हैं, जिनके अंग विभिन्न अलंकरणों से सुसज्जित हैं, जो वृंदावन की 'केली' लीला में सर्व-कुशल हैं, जिनका वैभव करोड़ों चन्द्रमाओं से भी अधिक शोभायमान है

  3. श्री श्यामां मधुरस्वरां सुनयनां - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामीनी जी ध्यानम (7)

    श्रीराधा की वाणी मधुर है और आंखें अति सुन्दर हैं, वे बहुत बुद्धिमान हैं और श्रीकृष्ण की प्रिय हैं। वे समस्त लक्षणों से परिपूर्ण हैं जो अपनी दासियों को प्रेम प्रदान करती हैं और सर्व इच्छा को पूर्ण करनेवाली हैं। मैं उन श्री राधा की आराधना एवं पूजा करता हूँ, जिनके समस्त अंग अत्यंत सुंदर हैं। जो श्री कृष्ण के वाम भाग में अवस्थित हैं, उन परम सुखमयी परमेश्वरि श्री राधा की मैं बार-बार वंदना करता हूँ।

  4. रासक्रीड़ासमासक्तं परात्परतमं - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामीनी जी ध्यानम (5)

    युगल किशोर श्री राधा कृष्ण अत्यंत उदार हैं, रास-क्रीड़ा में आसक्त हैं तथा एक-दूसरे के प्रेम में विह्वल हैं। मैं उनके चरण कमलों को सदा प्रणाम करता हूँ।

  5. गौरश्यामं कृपासाध्यं - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामीनी जी ध्यानम (4)

    मैं उन दिव्य युगल श्री गौर श्याम [राधा कृष्ण] को प्रणाम करता हूँ जो केवल कृपा साध्य हैं, कोटि-कोटि कंदर्पों से भी सुन्दर हैं एवं जिनकी कोटि-कोटि सखियाँ सेवा में उपस्थित हैं।

  6. किशोरं युगलंवन्दे वृन्दावनविहारिणम् - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनी जी ध्यानम् (3)

    मैं उस युगल किशोर जोड़ी (राधा कृष्ण) को नमन करता हूं जो वृंदावन में विहार पारायण हैं, समस्त कलाओं एवं गुणों से युक्त हैं, एवं निकुंजों में निवास करते हैं। वे समस्त प्रकार के आध्यात्मिक विघ्न को मिटाने वाले हैं।

  7. वन्देऽहं सच्चिदानन्दं कृष्णं - श्री विट्ठलनाथ (गुसाईं जी), श्री स्वामिनी जी ध्यानम् (2)

    मैं उन कमल नयन सच्चिदानन्दं श्री कृष्ण को प्रणाम करता हूँ जो श्री राधिका के अधर रूपी सुधा निधि का पान कर [एवं अभिलाषा कर] कभी भी पूर्ण संतुष्टि को प्राप्त नहीं करते ।

  8. चिन्तनाद्यस्य तत्वस्य रसज्ञा - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनी जी ध्यानम् (1)

    जिन चरणों [रस के सार तत्व] का चिंतन करने से रस के पूर्ण ज्ञाता (अर्थात रसिक प्रेमी जन) भक्ति की पराकाष्ठा को प्राप्त करते हैं, ऐसे श्री राधा के चरणों को मैं प्रणाम करता हूँ ।