मन पछितैहै अवसर बीते - श्री तुलसीदास जी
हे मन! यदि यह अवसर निकल गया तो अंत में केवल पश्चाताप ही हाथ लगेगा। इस दुर्लभ मानव देह को पाकर, कर्म, वचन और हृदय—तीनों से श्री हरि के चरणों का अनन्य भाव से भजन कर।
श्री तुलसीदास (1532-1623), जिन्हें गोस्वामी तुलसीदास के नाम से भी जाना जाता है, एक हिंदू वैष्णव संत और कवि थे, जो प्रसिद्ध श्री राम चरित मानस के लेखक, राम की भक्ति के लिए प्रसिद्ध थे।
9 लेख उपलब्ध हैं
हे मन! यदि यह अवसर निकल गया तो अंत में केवल पश्चाताप ही हाथ लगेगा। इस दुर्लभ मानव देह को पाकर, कर्म, वचन और हृदय—तीनों से श्री हरि के चरणों का अनन्य भाव से भजन कर।
एक बार मीराबाई ने तुलसीदास जी से पूछा — “मेरे परिवारवाले भजन-मार्ग में बाधा पहुँचाते हैं, मुझे क्या करना चाहिए?” इस प्रश्न के उत्तर में तुलसीदास जी ने यह पद रचकर उन्हें भेजा। जिसको भगवान राम प्रिय न हों अर्थात् जिसका भगवान से प्रेम न हो, भले ही वे हमारे अत्यन्त स्नेही क्यों न हों, फिर भी उन्हें करोड़ों शत्रुओं के समान त्याग देना चाहिए।
भले ही परम पवित्र नदियाँ जैसे गंगा, यमुना, सरस्वती और सातों समुद्र जल से भरे हों, परन्तु चातक पक्षी के लिए स्वाति नक्षत्र का जल छोड़कर बाकी सब जल धूल के समान है क्योंकि चातक अनन्य भाव से केवल स्वाति की बूँद की ही प्रतीक्षा करता है और उसी को ग्रहण करता है। भाव यह है कि चाहे संसार में कितनी ही महान विभूतियाँ क्यों न हों, परन्तु एक सच्चा प्रेमी अपने प्रियतम के अतिरिक्त किसी और को स्वीकार नहीं करता और न ही किसी अन्य से कुछ चाह रखता है।
गोस्वामी श्री तुलसीदास जब वृन्दावन पधारे तो यहाँ की रसोपासना-भक्ति देखकर चकित रह गए। उन्होंने कहा — वृन्दावन की इस रसोपासना-भक्ति का सम्पूर्ण रहस्य कोई नहीं समझ सकता। यहाँ के तो प्रत्येक वृक्ष, हर डाली और हर पत्ते से “राधे-राधे” का मधुर नाम निरंतर गूँज रहा है।
जब श्री तुलसीदास जी महाराज वृन्दावन आये और उन्होंने यहाँ की दिव्यता को देखा, तब वह बोले , यहाँ के तो पत्ते, वृक्ष एवं पौधे तक केवल ‘राधा राधा’ ही रटते हैं।
इस स्थान पर, भगवान कृष्ण ने गोस्वामी तुलसीदास जी को भगवान राम के रूप में दर्शन दिए थे। गोस्वामी तुलसीदास की भजन कुटी भी प्रवेश द्वार के दाईं ओर स्थित है।
श्री तुलसीदास जी महाराज कहते हैं कि जब उन्होंने श्री वृन्दावन धाम और वैकुण्ठ धाम को उनके रस से तौला, तो दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर पाया। श्री वृन्दावन धाम तराज़ू में नीचे रहा और वैकुण्ठ धाम न जाने कहाँ आकाश में चला गया। वृन्दावन-रस के समान कोई रस कहाँ!
जब श्री तुलसीदास जी महाराज वृन्दावन आए और उन्होंने यहाँ की दिव्यता का दर्शन किया, तब वे बोले— “क्या वृन्दावन में श्री राम के प्रति कोई विद्वेष है? क्योंकि यहाँ कोई ‘राम’ नहीं बोलता। यहाँ तो पत्ते, वृक्ष और पौधे तक केवल ‘राधा–राधा’ ही रटते रहते हैं।”
यह स्थान वृंदावन में स्थित है। यहाँ श्री कृष्ण दो रास्तों के बीच एक संकरे मार्ग से होकर, राधा और गोपियों से दूध और दही माँगते हैं।