वेदांत दशश्लोकी

वेदांत दशश्लोकी आद्य जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य द्वारा रचित है जो वेदांत के दार्शनिक दोहों का संग्रह है जिसमें श्री राधा कृष्ण की युगल भक्ति का ज्ञान मिलता है ।

4 लेख उपलब्ध हैं

  1. कृपास्य दैन्यादियुजि प्रजायते - जगद्गुरु आद्यनिम्बार्काचार्य, श्री वेदांत दश्श्लोकी (9)

    अनन्याधिपति सर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य कृपा दैन्य ह्रदय (दीनता युक्त) प्रपन्न भक्तों पर ही होती है जिसके फल स्वरूप उनमें रसमयी भक्ति प्रकट होती है वही फलरूपा एवं प्रेमलक्षणा उत्तमा भक्ति वर्णित है तथा ये प्रेमलक्षणा परा भक्ति अनन्य भागवतजनों के निर्मल अन्तःकरण में स्फुरित होती है। श्रवण कीर्तन आदि साधन रूपा भक्ति, अपरा भक्ति कहलाती है।

  2. नान्यागति: कृष्णपदारविन्दात - जगद्गुरु आद्यनिम्बार्काचार्य, श्री वेदांत दश्श्लोकी (8)

    जिसकी शक्ति और आशय का किसी को पता ही नहीं लग सकता फिर भी वे भक्तों की इच्छा के लिए अनेक अवतार धारण करते है। जिनकी ब्रह्मा शंकर आदि समस्त देवता वंदना करते है, उन श्रीराधाकृष्ण के चरणकमलों के अतिरिक्त मै कोई सहारा नहीं देखता ।

  3. उपासनीयं नितरां जनै: सदा - जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य, श्री वेदांत दश्श्लोकी (6)

    इन श्रीराधाकृष्ण युगल किशोरात्मक परब्रह्म की निरंतर उपासना करते रहना चाहिए । उनके ध्यान मात्र से अज्ञान ( तम अविद्या की) अनुवृति क्षीण हो जाती है।

  4. अंगे तु वामे वृषभानुजां मुदा - - जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य, श्री वेदांत दश्श्लोकी (5)

    अनुरूप सौभगारूप से कृष्ण के वामांग में आनन्दपूर्वक विराजमान, समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली बृषभानुजी श्री राधा को नमस्कार करता हूँ, जो सहस्रों सखियों द्वारा परिसेवित हैं।