विरह मंजरी [श्री नंददास जी]

विरह मंजरी श्री नंददास जी द्वारा रचित नंददास ग्रंथावली का सातवाँ अध्याय है जिसमें श्री कृष्ण के मथुरागमन के पश्चात् गोपियों के विरह दशा का वर्णन किया गया है।

3 लेख उपलब्ध हैं

  1. जलचर ज्यों जलभीर मै जानत नाहिन पीर - श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (30)

    जैसे जलचर जल में रहते हुए जल-वियोग की पीड़ा से अनभिज्ञ रहता है, परंतु उससे पृथक होते ही उसकी वेदना का अनुभव करता है, वैसे ही प्रभु-वियोग की वास्तविक पीड़ा वही जान सकता है जिसे उनके संयोग का साक्षात् अनुभव हुआ हो।

  2. और ठौर की आगि पिय, पानी पाय बुझाय - श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (67)

    हे प्रियतम! यदि किसी जगह आग लग जाती है, तो पानी वह आग बुझा देता है; परंतु यदि पानी में ही आग लग जाए, तो कहाँ जाकर बुझाया जाए? (भाव यह है कि जो श्रीकृष्ण समस्त संसार को शीतलता प्रदान करते हैं, यदि वे अपने विरह की अग्नि में इस प्रकार जलाएँगे, तो हृदय को शीतलता कौन प्रदान करेगा?)

  3. बड़ौ मन्द अरविन्द सुत - श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (13)

    सृष्टिकर्ता विधाता (अरविन्द-सुत) निश्चय ही प्रेम-तत्व की अनभिज्ञता के कारण उपहास के पात्र हैं; क्योंकि उन्होंने दर्शन के मध्य पलकों का व्यवधान उत्पन्न किया है। जब अनुरागी नेत्र श्री कृष्ण के मुखारविन्द की माधुरी का पान करते हैं, तब पलकों का निपात एक महान अंतराल जान पड़ता है। रसिकों के लिए पलक झपकने का वह क्षण भी युगों के समान दुष्कर और असह्य है।