एक अखंडित एकरस निरवधि रति जो होइ - श्री रसिक देव जी की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (4)
जो अखंड, एकरस और अनंत होता है, जहाँ मिलन में भी व्याकुलता कम नहीं होती, अपितु निरंतर बढ़ती रहती है उसी को प्रेम कहा जाता है।
विशिष्ट पद और साखी श्री ललित किशोरी जी द्वारा लिखित कुछ विविध पद और सखियाँ हैं, जिन्हें पहले उनके ग्रंथ में प्रकाशित नहीं किया जा सका था, लेकिन बाद में एक अलग संग्रह के रूप में प्रकाशित किया गया था।
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जो अखंड, एकरस और अनंत होता है, जहाँ मिलन में भी व्याकुलता कम नहीं होती, अपितु निरंतर बढ़ती रहती है उसी को प्रेम कहा जाता है।
श्री श्यामा कुंजबिहारी की दिव्य केली-रस में डूबे हुए रसिकों द्वारा अपनाई गई यह रस-रीति अत्यंत ही अद्भुत है। श्री रसिक देव जी कहते हैं कि श्री नरहरिदास जी की कृपा और प्रताप से ही रसिकों के संग उन्हें इस प्रेममय धाम में निवास का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।
मेरी रसिक बिहारी से ऐसी बनी हुई है कि वे पल भर को भी मेरा साथ नहीं छोड़ते, जिसे देखकर मुझे आश्चर्य होता है कि ये वन में रास रचाने कब जाते होंगे।
स्वामी श्री हरिदास जी की अखंड नित्य-विहारमयी उपासना अत्यंत दुर्लभ है— लाखों में कोई एक ही उसे समझ और धारण कर पाता है। इस दिव्य रस-परंपरा को प्राप्त करना सहज नहीं; असंख्य साधक प्रयास कर चले गए, परंतु विरले ही उसके अधिकारी बने।