रतन खचित कंचन महा - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (80)
श्रीवृन्दावन की महान भूमि रत्नों से जड़ी हुई स्वर्णमयी है जहाँ समस्त वृक्ष कल्पवृक्ष हैं और फल-फूलों से लदी डालियाँ झूमती रहती हैं।
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श्रीवृन्दावन की महान भूमि रत्नों से जड़ी हुई स्वर्णमयी है जहाँ समस्त वृक्ष कल्पवृक्ष हैं और फल-फूलों से लदी डालियाँ झूमती रहती हैं।
जो व्यक्ति मार्ग में गमन करते हुए केवल ‘राधा’ नाम का स्वच्छन्द उच्चारण करता है उसका बहुमान करते हुए आगे-आगे चक्रधारी श्रीविष्णु भगवान, पीछे पीछे शूलधारी श्रीशिवजी, वाम भाग में पाशहस्त श्रीवरुणदेव और दक्षिणभाग में वज्रधारी इन्द्रदेव चलते हैं, तथा अप्सरायें आगे-आगे नृत्य करती हैं और देवाङ्गनायें कल्पवृक्ष के फूलों की वर्षा हर्ष से करती हैं।
अरी सजनी ! आज विमल कल्पवृक्ष के तीर यमुना पुलिन पर श्रीगोपाल लाल रास क्रीड़ा कर रहे हैं । सजनी ! जैसा निर्मल शरद का समय है वैसा ही सुन्दर चन्द्रमा आकाश में शोभित है और रोचक त्रिविध ( शीतल मन्द सुगन्धित ) पवन भी बह रहा है ।
श्री श्यामसुन्दर कहते हैं: अरे सब सखाजन सुबल, श्रीदामा, तुम लोग सुनो! वृन्दावन मुझे बहुत प्रिय है, इसी कारण व्रज से मैं यहाँ वन में गायें चराने आता हूँ ।
नित्यनिकुञ्जबिहारी युगलकिशोर श्री राधा कृष्ण के परम दिव्य लीलाविहार केलि रस से अभिषिक्त तथा कलिन्दतनया श्रीयमुना के गम्भीर धारा प्रवाह से सर्वदा समन्वित एवं अपने दिव्यातिदिव्य लोकोत्तर अनिर्वचनीय गुण समूह से प्रकाशमान, श्री युगल प्रिया-प्रियतम के ललित चरणारर्विन्द रज रेणु कणिका से जहां के समस्त प्राणीमात्र परम पवित्र हैं ऐसे कल्पवृक्ष स्वरूप परम सुंदर परम रमणीय श्री वृन्दावन धाम का मैं प्रात:काल स्मरण करता हूँ।