मोच्छहु की माया मिटै - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (14.2)
मोक्ष आदि की लालसा ह्रदय से मिट जाये एवं समस्त भव रोगों का नाश हो जाय। हे श्यामा श्याम, मेरी यही इच्छा है कि तुम दोनों के चरणों का संयोग सदा बना रहे।
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मोक्ष आदि की लालसा ह्रदय से मिट जाये एवं समस्त भव रोगों का नाश हो जाय। हे श्यामा श्याम, मेरी यही इच्छा है कि तुम दोनों के चरणों का संयोग सदा बना रहे।
मोक्ष देकर ज्ञान समाप्त हो जाता है, स्वर्ग देकर अच्छा कर्म समाप्त हो जाता है । किंतु केवल एक भक्ति ही ऐसी है जो सदा अमर रहती है जहां भक्त को स्वर्ग, मोक्ष आदि की कामना नहीं होती ।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों सहित समस्त सुख प्रदान करने वाले श्री गोवर्धनधर प्रभु श्रीकृष्ण ही गोकुल के त्राता और भक्तों के रक्षक हैं; अतः उनकी ही शरण ग्रहण करनी चाहिए।
श्री कृष्ण का प्रेमपूर्वक कीर्तन करने से जो सुख (रस) प्राप्त होता है, वह जप, तपस्या और करोड़ों तीर्थों में स्नान करने से भी नहीं प्राप्त होता ।
भक्ति रहित जो भी व्रत, तप, वेद-पाठ, नियम यम,संयम आदि बड़े-बड़े साधन हैं, कष्ट साध्य एवं क्लेशदायक हैं तथा इनका प्रवेश भक्ति-देवी के द्वार तक नहीं है । ये सभी याचकों की भाँति भक्ति-देवी की कृपा की आकांक्षा लिये उनके द्वार पर पड़े रहते हैं ।
श्री वृंदावन धाम में दो राजा हैं। एक हैं श्रीकृष्ण और दूसरी श्री राधिका रानी। समस्त इच्छाएं, धर्म (धर्म), धन (अर्थ), सुख (काम) और मुक्ति (मोक्ष) एक मजदूर के रूप में यहाँ अपना कर्तव्य निभाते हैं और मुक्ति स्वयं एक जल वाहक है।
यह संसार एक अथाह सागर के समान है, जिसमें यह मनुष्य-रूपी मीन (मछली) काल के क्रूर घड़ियालों और मगरमच्छों जैसे हिंसक विषयों से घिरी हुई है, जो उसे प्रतिपल निगलने के लिए तत्पर रहते हैं।
श्री हरि सकामी लोगों को अष्ट सिद्धि, नव निद्धि एवं मुक्ति पद देकर बहका देते हैं, किन्तु युगल सरकार रस के अनन्य उपासक, निज वृन्दावन केलि महल की सीमा एवं रस को छोड़कर एक क्षण के लिए भी इन चक्करों में नहीं फसते।
भावार्थ : समस्त मुनिगण आपके चरणों की वंदना करते हैं, आप तीनों लोकों का शोक दूर करने वाली हैं, आप प्रसन्नचित्त प्रफुल्लित मुख कमल वाली हैं, आप धरा पर निकुंज में विलास करने वाली हैं। आप राजा वृषभानु की राजकुमारी हैं, आप ब्रजराज नन्द किशोर श्री कृष्ण की चिरसंगिनी है, हे जगज्जननी श्रीराधे माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? (१)
हे रासेश्वरी राधे! मुझे तो एकमात्र तुम्हारा ही अवलम्ब है। मैं जिस कोटि का पतित हूँ, उसे तुम्हारे सिवा और कोई भी सांसारिक जीव नहीं जानता।