5 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. श्री वृन्दावनदेवाचार्य जी की जीवनी

    श्री वृन्दावन देवाचार्य जी श्रीनिम्बार्क संप्रदाय के एक महान् प्रतापी आचार्य हो गये हैं । आचार्यपीठ सलेमाबाद (अजमेर), जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर एवं किशनगढ़ आदि राज्यों की तवारिखों में 1735 से 1797 तक इनके नामों का उल्लेख मिलता है ।

  2. प्रत्यङ्गोच्छलदुज्ज्वलामृत - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (135)

    प्रेम का एक अनुपम परिपूर्णतम सागर है। जिसके अङ्ग-प्रत्यङ्गों से नित्य-प्रति उज्ज्वल अमृत-रस उच्छलित होता रहता है । वह (प्रेममहानिधि ) लावण्य का भी अनुपम समुद्र है और अत्यधिक कृपामय वात्सल्य-सार का भी अम्बुधि है । वह तारुण्य के प्रथम-प्रवेश से विलसित माधुर्य-साम्राज्य की भूमि है, और रस की एकमात्र सीमा है । वही ‘राधा’ नामक कोई परम-गुप्त महानिधि सर्वोत्कर्ष-पूर्वक विराजमान है।

  3. प्रेमोल्लासैकसीमा परम रसचमत्कार वैचित्र्य सीमा - श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (130)

    प्रेमोल्लास की चरम सीमा, परम रस( प्रेम) चमत्कार विचित्रता की सीमा, सौन्दर्य्य की अंतिम सीमा, अनिर्वचनीय नवीन वय, रूप एवं लावण्य की सीमा; निजजनों के प्रति परम उदारता एवं वात्सल्यता की सीमा, लीला-माधुर्य्य की सीमा, रति-कला-केलि-माधुरी की सीमा एवं सुख की परम सीमा केवल और केवल श्रीराधा ही सर्वोत्कृष्टता को प्राप्त हैं।

  4. वैदग्ध्य सिन्धु अनुराग-रसैक सिंधु - हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (17)

    कला विलास की सिंधु, अनुराग रस की एक मात्र सिंधु, अतिशय ममत्व एवं वात्सल्य की सिंधु, अत्यंत प्रगाढ़ कृपा की सिंधु। , अत्यंत मोहिनी एवं लावण्य सिंधु, अमृत छवि साक्षात् महाभाव स्वरुप सिंधु, अंतरंग केलि सिंधु स्वरूपा श्री राधा मेरे हृदय में प्रकट हों।

  5. श्री निकुंज रहस्य-स्तव - श्रील रूप गोस्वामी द्वारा प्रार्थना

    रे मन! तू परम मनोहर कैशोर वयस वाले और मुक्ता फल की छाया की तरह नव-लावण्य के राशि रूप तथा नवायमान श्रृंगाररस में चञ्चल चित्त वाले तथा जिनके नवीन प्रेम ही परम धन है और निधुवन की लीला कौतुक में अत्यन्त चञ्चल श्री राधिका कृष्णचन्द्र को निभृत निकुञ्ज में स्मरण कर।