गर्ग संहिता

श्री गर्गाचार्य ने गर्ग संहिता की रचना की जो श्री कृष्ण की भक्ति पर आधारित है।

8 लेख उपलब्ध हैं

  1. नमोऽस्तु भूमन्युवयोः पदाब्जे सदैव वृन्दावन मध्य वास - गर्गसंहिता, वृन्दावनखण्डः (2.25.30)

    श्री सदाशिव ने कहा — हे वृन्दावन-मध्य में सदैव वास करने वाले प्रभु (श्री राधा-कृष्ण)! आप दोनों के युगल चरण-कमलों में हमारा कोटि-कोटि प्रणाम है। हमें आपके श्री-चरणों के अतिरिक्त अब कुछ भी रुचिकर नहीं लगता। हम आपके नित्य धाम श्री वृन्दावन को छोड़कर एक पल के लिए भी कहीं अन्यत्र रहना नहीं चाहते। हे श्री हरि! हे श्री राधिका! आप दोनों को हमारा बारंबार प्रणाम है।

  2. राधाकृष्‍णेति हे गोप ये जपन्ति पुन: पुन: - गर्ग संहिता, गोलोक खंड (15.71)

    जो मनुष्य श्री “राधा कृष्ण” यह बारम्बार रटता है उन को चारों पदार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का क्या कहना साक्षात श्री कृष्ण चंद्र भगवान ही मिल जाते हैं ।

  3. वेदनाग क्रोश भूमिं स्वधाम्न: श्री हरि: स्वयम - गर्ग संहिता, गोलोक खंड (3.33)

    श्री नारद जी कहते हैं कि भगवान श्री हरि ने चौरासी कोस ब्रज मंडल, गोवर्द्धन, एवं श्री यमुना जी को स्वयं गोलोक धाम से प्रकट रूप में भेजा है ।

  4. प्रागुदीच्यां बहिर्षदो दक्षिणस्यां यदोः पुरात् - गर्ग संहिता

    विद्वानों ने ब्रज चौरासी कोस भूमि को कहा है की यह वर्हीशद (बारहाड़ा) के पूर्व में, यदुपुर के दक्षिण में (बटेश्वर, शूरसेन का गाँव) और शोणितपुर (सोनहद) के पश्चिम में 'ब्रज' या 'मथुरा मंडल' के नाम से जानी जाती है।

  5. यत्र वृन्दावनं नास्ति न यत्रा यमुना नदी यत्र गोवर्धनो नास्ति तत्र में न मनह सुखम - गर्ग संहिता

    श्री राधा रानी ने कहा: मेरा दिल ऐसे स्थान पर खुश नहीं हो सकता है जहां कोई वृंदावन, यमुना नदी नहीं है, और कोई गोवर्धन पर्वत नहीं है।

  6. ये राधिकायां मयि केशवे मनाग् - गर्ग संहिता (2.15.32)

    मुझमें (श्रीकृष्णमें) और तुममें (श्रीराधामें) कोई भी अंतर नहीं है। लीला रस की दृष्टि से तो ठीक, लेकिन जो अधम मनुष्य मुझे तुमसे पृथक मानता है दुर्भावना से, वह जब तक चन्द्रमा और सूर्य रहेंगे, तबतक ‘कालसूत्र' नामक नरक में रहेगा।