गीतामृत गंगा

गीतामृत गंगा निम्बार्क संप्रदाय के श्री वृंदावन देवाचार्य द्वारा लिखित ब्रज भाषा का ग्रंथ है।

5 लेख उपलब्ध हैं

  1. कबहुँ न विछुरै जोरि यह, दम्पति जनमन चोर - श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा (8.3)

    जैसे सूर्य की किरणें सूर्य से कभी पृथक नहीं होतीं, वैसे ही श्रीहरि और श्री राधिका एक क्षण के लिए भी अलग नहीं होते—दोनों सदा अभिन्न हैं।

  2. कबहुँ न विछुरै जोरि यह, दम्पति जनमन चोर - श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा (8.2)

    यह दिव्य जोड़ी (श्री राधा-कृष्ण) एक क्षण के लिए भी बिछुड़ती नहीं है एवं सबके मन को हर लेने वाली है। यह सदा एकरस रहती है, और प्रेम में सराबोर होकर नित्य विहार में तल्लीन रहती है।

  3. नेह निगौड़े को पैडौ ही न्यारौ - श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा (4.70)

    प्रेम के मार्ग की गति ही न्यारी है । जो भी इस मार्ग का पथिक है उसे अंधा होकर ही चलना होता है (अर्थात् यहाँ आत्मसमर्पण कर चला जाता है और प्रेमास्पद के बाह्य गुण एवं दोष को नहीं देखा जाता) तभी उसे वस्तु की प्राप्ति हो सकती है ।

  4. बक विषयीजन परस इहि वेऊ विमल ह्वै जाउ - श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा

    जिस प्रकार पारसमणि के स्पर्श से लौह-धातु भी स्वर्ण-रूप में परिवर्तित होने लगती है, चाहे वह स्पर्श जान-बूझकर किया गया हो या अनजाने में, उसी प्रकार भक्तों का ही नहीं, यदि घोर विषयी जन भी इस वृन्दावन-रस की भक्ति का स्पर्श प्राप्त करते हैं, तो उनका हृदय भी परिवर्तित (शुद्ध) होने लगता है।

  5. वृंदावन गिरी तैं चली रस की उठत तरंग - श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा

    वृन्दावन हिमगिरि से प्रवाहित इस गीतामृत-गंगा की रस-धारा से रस की तरंगें उठती हैं, जिनमें रसिक भक्तों के मन नित्य स्नान करते रहते हैं।